सोमवार, 15 नवंबर 2010

तुम्हारी बिंदी













होना चाहा था
मैंने  तुम्हारी बिंदी
तुमने कहा
बन जाओ
उतार दिया तुमने
अगली सुबह

खुश थी तुम
जब मैं ने कहा था
बना लो
अपनी बिंदी मुझे
तुम्हारी हाँ से
खुश हुआ था
मैं भी कितना
आज जब
मिल नहीं रहा था
मेरा रंग
तुम्हारी साडी के रंग से
तुमने देखा भी नहीं
मेरी ओर

एक बार
तुमने कहा था
मुझे
अपने माथे की बिंदी
मैंने वादा किया
चमकने को चिरंतन
मैं चमकता रहा
सूरज की तरह
दिन भर
उतारती रही तुम
हर रात .

31 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय अरुण चन्द्र रॉय जी..
    नमस्कार !
    किसकी बात करें-आपकी प्रस्‍तुति की या आपकी रचनाओं की। सब ही तो आनन्‍ददायक हैं।
    .........आपकी लेखनी को नमन बधाई

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  2. अरुण जी..
    कैसे लिख जाते हो ऐसा सब
    वाह !कितनी अच्छी रचना लिखी है आपने..! बहुत ही पसंद आई
    एक बार
    तुमने कहा था
    मुझे
    अपने माथे की बिंदी
    मैंने वादा किया
    चमकने को चिरंतन
    मैं चमकता रहा
    सूरज की तरह
    दिन भर
    उतारती रही तुम
    हर रात .
    ..बहुत ख़ूबसूरत...ख़ासतौर पर आख़िरी की पंक्तियाँ....मेरा ब्लॉग पर आने और हौसलाअफज़ाई के लिए शुक़्रिया..

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  3. बहुत खूब,
    एकदम नए भावों और नए कथ्य से सजी, चमकती हुई कविता।

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  4. बडे गज़ब के भाव भरे हैं बिन्दी को लेकर्………………सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  5. shandaar..............lekhni ki dhar ko naman aur dharak ko bhi!

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  6. वाह क्या बात है... अद्भुत प्रयोग है और बारीक भावाभिव्यक्ति
    बेहतरीन

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  7. वाह....

    अभिनव प्रयोग....

    लेकिन स्त्री एक बार यदि इस बिंदी को माथे से लगा ले तो ,केवल माथे से नहीं मन से लगा लेती है और माथे से इसे मन भरने के कारण,यह पानी से धुले गले नहीं ,इसलिए उतारती है..माथे से यह उतर भी जाये पर मन से यह कभी नहीं उतरती..

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  8. प्रताड़ित और व्यथित पुरुष भी होते हैं ...मगर अभिव्यक्त नहीं कर पाते ..
    बहुत कम ही पढने को मिलती है ऐसी रचनाएँ ...
    मैं रंजना जी से भी सहमत हूँ !

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  9. एक बार मजरूह साहब ने कहा था,"तेरी बिंदिया रे" और आज आपने कह दिया. बिंदिया के ये तीन शेड्स वाकई निंदिया उड़ाने के लिए काफी हैं... एक नए अंदाज़ में रूमानियत बिखेरती कवितायें!!

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  10. एकदम नए भावों से सजी बेहद............ख़ूबसूरत
    कविता।

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  11. भाई वाह...प्रशंशा के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास...विलक्षण रचना है ये आपकी...अद्भुत प्रयोग किया है बिंदी के साथ...लाजवाब..

    नीरज

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  12. बहुत ही ख़ूबसूरत रचना. शब्दचित्र...लाजवाब

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  13. परिवार में गर्व और गौरव, एक सुन्दर रचना।

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  14. बहुत सुन्दर कविता। सुन्दर भावों के साथ साथ प्रतीकों में अद्भुत अर्थ प्रयोग किया है आपने।
    बधाई।

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  15. चित्र भी अच्छा है और कविता भी
    आपको बधाई

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  16. भई वाह !!!!! ये माजरा क्या है ?????? समझने में समय लगेगा!!!!!! इतना मक्खन लगाओगे बिंदिया पर तो सर्दी में जम जायेगा

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  17. बहुत खूब .. बिंदी के माध्यम से दिल की भावनाओं को व्यक्त करना .... गज़ब की कल्पना है अरुण जी ...

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