मंगलवार, 16 नवंबर 2010

अपनी चिट्ठियों की चिंता में


हार कर नहीं
स्वेच्छा से चेहरे पर हंसी लिए
मरना चाहता हूँ मैं
आत्महत्या नहीं होगी यह

पता है मुझे
मेरे जाने के बाद
सब कुछ ठीक हो जायेगा
बेटियाँ चली जाएँगी
ससुराल
बेटे व्यस्त हो जायेंगे
अपने में
पत्नी भी
श्रंगार  पेटी में रखी
शादी के समय की तस्वीर को
फिर से बनवा कर
दीवार पर टांग देगी
फिर रम जाएगी
भजन कीर्तन में
मर नहीं पा रहा मैं
क्योंकि
नहीं पता मुझे
क्या होगा
मेरे प्रेम पत्रों का
जिन्हें दशको से
सहेजा है मैंने
पत्नी, पुत्र और  पुत्री की तरह.

जब भी अकेला हुआ हूँ
इन्ही पत्रों ने  दिया है
मेरे अकेलेपन का साथ
जब भी चौराहे पर
पाया मैंने खुद को
इन्ही पत्रों ने  किया मेरा
मार्गदर्शन
कई बार
नदी के ऊपर के पुल से
लौटा हूँ बस इनके लिए ही

हजारों जुगनू
चमकने लगते हैं
यदि रात में खोल दो इन्हें
दिन में तितलियाँ उडती हैं इनसे
महकती हैं ये चिट्ठियां
ताजे गुलाब की तरह
कई बार तो महसूस किया है
पत्नी के गजरे की खुशबू भी
अपने हर जन्मदिन पर
उपहार की तरह लगती हैं ये

सोचता हूँ
मरने से पहले
किसी नदी में
प्रवाहित कर दू
अस्थियों की भांति
इन चिट्ठियों को
लेकिन डरता हूँ
कैसे रह पाउँगा
अपने बचे-खुचे दिनों में
इनके बिना

जब तक हैं
ये चिट्ठियां
मर नहीं सकता मैं
कह रहा है
वर्षों का साथ

34 टिप्‍पणियां:

  1. अनकही बातों को अच्छे से बाँधा है शब्दो मे……………एक नयी सोच देती रचना दिल को छू गयी।

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  2. जब तक हैं
    ये चिट्ठियां
    मर नहीं सकता मैं
    कह रहा है
    वर्षों का साथ
    Badee hee anoothi rachana!Salmat rahen aap aur aapki chitthiyan!

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  3. जब तक हैं
    ये चिट्ठियां
    काफी सुंदर तरीके से अपनी भावनाओं को अभिवयक्त किया है ...

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  4. अरूण भाई,
    मेरे हिसाब से आपकी इस रचना में मूल कविता कुछ इस तरह है-


    इस दुनिया से
    हार कर नहीं
    उकताकर जब भी सोचता हूं
    मरने की बात
    मरने के पहले
    उन पत्रों, प्रेम पत्रों की आती है याद
    जो रखें हैं वर्षों से
    मैंने सहेजकर


    मरने से पहले
    उन्हें ठिकाने
    लगाना चाहता हूं
    पर फिर
    एक आखिरी बार
    पढ़ लेना चाहता हूं उन्हें पूरी तन्मंयता से

    जब भी
    अकेला हुआ हूँ
    इन्ही पत्रों ने दिया है
    मेरा साथ

    जब भी
    दोराहे पर
    पाया है खुद को
    इन्हीं ने
    दिखाया है रास्ता


    हजारों जुगनू
    चमकने लगते हैं
    अंधेरे में इनके खुलते ही

    तितलियाँ उड़ने लगती हैं
    उदासी के आकाश में

    महकता है
    इनमें बसा प्रेम
    ताजे गुलाब की तरह


    गाहे-बगाहे
    अपने
    जन्मदिन पर
    उपहार की तरह लगते हैं ये

    लगता है
    जब तक ये हैं
    पत्र,प्रेमपत्र मेरे
    मर नहीं सकता मैं
    कह रहा है
    वर्षों का साथ

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  5. इतना प्यार चिठ्ठियों से!!!!!!!!!! अरे मरें चिठ्ठियों के दुश्मन. सहेजना भी एक कला है और सब अपने अपने ढंग से कुछ न कुछ सहेजते है. कोई दुःख दर्द, कोई खुशियाँ, कोई बीते हुए पल. अच्छा लगा आपका चिठ्ठियों को सहेजना

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  6. राजेश भाई बहुत बहुत धन्यवाद. सम्पादित कविता मूल कविता से बेहतर लग रही है. भविष्य में कभी इस कविता का अन्यत्र उपयोग हुआ तो सम्पादित कविता का उपयोग करने की अनुमति मांगूंगा. सादर

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  7. पुरानी यादें तन्हाई मे हमेशा जीने का सहारा होती हैं। अच्छी लगी कविता। बधाई।

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  8. अच्छी कविता है राजेश जी ने और संवार दिया है .

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  9. Tere khat aaj main ganga men baha aaya hun
    aag bahte hue paani me laga aaya hun.. :)

    achhi rachna hai arun ji aapki..is nazm ki yad dila gayi.. :)

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  10. chiththiyan bhoot, wartman aur bhawishya ki wahak hain. badhai, sundar rachna ke liye ...........!

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  11. अरुण जी!स्वप्निल जी की बात को आगे बढाते हुये मेरी एक नज़्म जो मेरे मन की बात कहती हैः
    ना ना ऐसा कभी नहीं करना
    चिट्ठियाँ रूह की मानिंद हुआ करती हैं
    प्रेम की पातियाँ तो ऐसे चिपट जाती हैं इंसान से बस
    मौत आए भी तो वो छोड़ती नहीं उसको.
    आग उनको जला नहीं सकती
    और न पानी भिगो ही सकता है
    कब सुखा पाई है हवा उनको
    कब किसी आले से हो पाए हैं वो ख़त यूँ हलाक़!
    आग में उनको जला डाला
    और प्रवाह किया अस्थियों को गंगा में
    तब भी वो हर्फ हर्फ रूह पे रह जाएगा
    जिस्म हो जाएगी फनाँ बेशक़
    रूह की क़ैद से कैसे मिटाओगे वो लफ्ज़
    प्रेम की पातियों के जुगनू से जलते वो लफ्ज़!!

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  12. यादें कहाँ शान्ति स्थापित होने देती हैं।

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  13. मर नहीं पा रहा मैं
    क्योंकि
    नहीं पता मुझे
    क्या होगा
    मेरे प्रेम पत्रों का
    जिन्हें दशको से
    सहेजा है मैंने
    पत्नी, पुत्र और पुत्री की तरह.
    वाह!! बहुत से लोगों के मन की बात है ये अरुण जी. बहुत सी ऐसी सहेजी हुई यादें होती हैं जो मरने नहीं देतीं.

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  14. जीवन पर्यंत मोह के अवयव जीवन से बांधे रखते हैं.कुछ हद तक इनका बांधे रखना ठीक भी है..क्युकी ये सब साजो सामान भी ना हो तो जिंदगी नीरस लगने लगती है. सुंदर यथार्थ पर टिकी एक सुंदर सृजन.

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  15. एक कविता ऐसी ही कुछ मैंने लिखी थी जो आपके साथ शेयर करना चाहूंगी.

    http://anamika7577.blogspot.com/2009/11/blog-post_30.html

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  16. 8/10

    बरखुदार आपकी यह चौथी रचना है जिसको मैंने निजी तौर पर अपने पास दर्ज किया है. आप प्रभावित तो करते ही हैं साथ भी चकित भी करते हैं. संवेदनाओं के स्तर पर आपकी कविताओं की मारक क्षमता गजब की है. यह कविता मन के भीतर की शून्यता बेतरह बढ़ा देती है.

    जिंदाबाद

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  17. अरूणजी, बहुत सुन्दर लिखा है आपने।

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  18. आप इसे तरह जीते रहें, और इन पत्रों को सहेजे रखें, दोनों बेशक़ीमती हैं।

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  19. सुभानाल्लाह ......!!

    अरुण जी बड़े दिल से लिखी है रचना .....
    कुछ पंक्तियाँ तो छू गयीं .....

    हजारों जुगनू
    चमकने लगते हैं
    यदि रात में खोल दो इन्हें
    दिन में तितलियाँ उडती हैं इनसे
    महकती हैं ये चिट्ठियां
    ताजे गुलाब की तरह...

    लाजवाब .....!!
    मोहब्बत के लिए इस से बेमिसाल पंक्तियाँ हो ही नहीं सकतीं .....

    रचना के मानिंद तारीफ नहीं कर पाई हूँ .....!!

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  20. और एक बात कहूँ ....
    मुझे आपकी ही कविता ज्यादा बेहतर लगी है .....
    इसलिए इस इसी रूप में रहने दें ....!!

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  21. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है! हार्दिक शुभकामनाएं!
    लघुकथा – शांति का दूत

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  22. हजारों जुगनू
    चमकने लगते हैं
    यदि रात में खोल दो इन्हें
    दिन में तितलियाँ उडती हैं इनसे
    महकती हैं ये चिट्ठियां
    ताजे गुलाब की तरह...

    कमाल की रचना है जनाब.

    उत्तर देंहटाएं
  23. bahut achhi rachna hai, kafi gehrai liye hue hai, achha laga padhna.

    shubhkamnayen

    उत्तर देंहटाएं
  24. अरूण भाई कविता आपकी ही है । चाहे मूल हो, चाहे संपादित। आप उसके उपयोग के लिए स्‍वतंत्र हैं।

    हां यहां मैं एक बात जरूर कहना चाहता हूं अन्‍य पाठकों से भी और उन मोहतरमा से भी जिन्‍होंने कहा,

    और एक बात कहूँ ....
    मुझे आपकी ही कविता ज्यादा बेहतर लगी है .....
    इसलिए इसे इसी रूप में रहने दें ....!

    कविता को संपादित करने का यह दुस्‍साहस मैं अरूण जी की कहने पर ही करता हूं। यह उनका ही आग्रह होता है कि मैं उनकी कविताओं पर अपनी टिप्‍पणी करुं। कई बार मैं यहां टिप्‍पणी करता भी नहीं हूं उन्‍हें मेल से भेज देता हूं। वे चाहते हैं कि मैं यहां भी टिप्‍पणी करूं।
    इसलिए मेरा आग्रह यह है कि जो भी कहें सोच समझकर कहें।

    उत्तर देंहटाएं
  25. अरूण जी आपकी कविता के बहाने से एक और बात। कोई भी कविता एक मुक्‍कमल कविता होती है। उसकी चंद पंक्तियां उसे मुक्‍कमल कविता नहीं बनाती हैं। हां हो सकता है कि वे सबसे जानदार और शानदार पंक्तियां हों उस कविता की। और जो लोग मानते हैं कि ये चंद पंक्तियां तो दिल को छू गईं वे कहीं न कहीं अनजाने में यही बात कह रहे होते हैं कि कविता का बाकी हिस्‍सा बेकार है। इसलिए आपसे भी आग्रह है कि कविता को लिखते समय और औरों की कविता को पढ़ते समय भी इस बात को अगर ध्‍यान में रखेंगे तो एक मुक्‍कमल कविता भी कर पाएंगे।

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  26. @राजेश भाई
    आपके संपादन से मेरी कविता के प्रति समझ बढ़ रही है. इसलिए मुझे अच्छा लगता है आपका संपादन और आपकी टिप्पणी. जहाँ तक अन्य पाठको का प्रश्न है यदि वे स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखते भी हैं तो कोई हर्ज़ नहीं. वैसे आपकी दूसरी टिप्पणी से पाठक को कविता को पढने में और समझने में दिशा मिलेगी. सार्थक टिप्पणी के लिए धन्यवाद

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  27. @चला बिहारी ब्लॉगर बनने (सलिल जी )
    मेरी कविता से उपजी आपकी नज़्म बेहतरीन लगी.. इस से मेरी कविता को नया अर्थ भी मिला..

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  28. आपकी चिट्ठिया मुझे भी यादों की खूबसूरत गलियों में लेकर चली गई. मन भीग गया. बहुत उर्जा ऊष्मा मिली. राजेश भाई ने कविता को बेहतर बना दिया है. 'चला बिहारी ब्लॉगर बनने' ने नए कविता लिख कर आपकी कविता पूरी कर दी... एक अच्छी कविता के लिए बधाई और शुभकामना !

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  29. सोचता हूँ
    मरने से पहले
    किसी नदी में
    प्रवाहित कर दू
    अस्थियों की भांति
    इन चिट्ठियों को ...
    भावनाओं का सैलाब उमड़ आया है इस रचना में .... बहुत गज़ब का लिखा है ....

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  30. @अरुण भाई,
    मुझे गद्य कविता की समझ बिलकुल नहीं (समझ तो ग़ज़ल की भी विशेष नहीं) फिर भी कुछ कवितायें पढ़ता हूँ तो अच्‍छी लगती हैं। उनमें से आपके ब्‍लॉग की कवितायें भी हैं। थोड़़ा बहुत ज्ञान कुछ टिप्‍पणियों से भी प्राप्‍त हो जाता है।
    मेरा मानना है कि अभिव्‍यक्ति में वैविध्‍यता एक सहज स्थिति है ऐसे में कुछ टिप्‍पणियों में सुझाव आना स्‍वाभाविक है और रचनाकार कितनी सहजता से उन सुझावों को स्‍वीकार या अस्‍वीकार करता है यह उसका निजि विषय है।
    अब अगर किसी कवि ने कहा कि 'कर दिये गंगा के हवाले, पत्र तेरे मित्र मेरे' और आप पत्रों को जीने की बात कर रहे हैं तो दो स्‍वतंत्र अभिव्‍यक्तियॉं साथ-साथ चलते हुए भी अस्तित्‍व बनाये रख सकती हैं।

    मैं उन्‍हें कैसे बहाता, वो मह्ज कागज़ न थे
    उनमें जो कुछ भी बसा था याद से जाता नहीं।
    कल दी हुई टिप्‍पणी किसी कारण से पोस्‍ट नहीं हो पायी, इसलिये कुछ और विस्‍तार हो गया।
    बहरहाल, एक अच्‍छी कविता के लिये बधाई।

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