मंगलवार, 23 नवंबर 2010

६० बरस दूर

शहर से 
कोई पचास किलोमीटर होगा
मेरा गाँव
जहाँ तक पहुँचने में 
यो तो लगेंगे 
कोई तीन ही घंटे 
लेकिन यकीन मानिये
यह  दूरी है कम से कम 
६० बरस .

६० बरस 
क्योंकि 
शहर से 
जब बढ़ेंगे 
मेरे गाँव की ओर
दिखेंगे आपको
सूखे खेत 
सूखे चेहरे 
बिन पानी की   नहर
बिन पानी के चेहरे 
६० बरस पुराने/खियाए चेहरे 

६० बरस 
क्योंकि
अभी नहीं पहुंची है
रौशनी यहाँ , 
बिजली के खम्भे 
जो गड़े थे 
शास्त्री जी के ज़माने में
खाकर जंग अब नहीं रहे 
उनके  अवशेष भी
नहीं है शेष. 

६० बरस 
इसलिए भी 
क्योंकि 
हर साल मरती हैं
कुछ बेटियाँ 
कुछ भाभियाँ
प्रसव  के दौरान
रेडियो पर 
सरकार की तमाम 
घोषणाओं के बावजूद . 

६० बरस 
इसलिए भी कि
योजनाओं को यहाँ पहुचने में 
लग गए हैं 
वाकई में 
६० बरस. 
अब भी पहुचेंगे 
इसकी गारंटी के लिए 
वैसे तो बनी हैं गारंटी नाम से कई स्कीमे 
लेकिन स्कीमों का क्या !

रेल में सवार हो
जाते हैं जो
लौट कर नहीं आते
तय नहीं कर पाते  
वापसी का सफ़र
क्योंकि 
मेरा गाँव 
अब भी 
इंडिया से पीढ़ियों दूर है 
प्रायः ६० बरस दूर. 

24 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी सटीक पंक्तियाँ रची हैं आपने....सच में बरसों की दूरी है....

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  2. ६० बरस
    इसलिए भी कि
    योजनाओं को यहाँ पहुचने में
    लग गए हैं
    वाकई में
    ६० बरस.
    अब भी पहुचेंगे
    इसकी गारंटी के लिए
    वैसे तो बनी हैं गारंटी नाम से कई स्कीमे
    लेकिन स्कीमों का क्या !


    सवाल बडा है ???????????????

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  3. मशहूर फ़िल्म संगीतकार नौशाद साहब की जब पहली फ़िल्म जुबली हुई और एक होटेल में अलंकरण समारोह आयोजित किया तो वो होटेल के टेरेस पर उदास खड़े थे.. किसी ने पूछा कि क्या बात है, तो वो बोले कि उस सामने वाले फुटपाथ से इस टेरेस तक आने में मुझे पंदरह साल लग गए...
    आज आपने जिस दूरी को बरसों में नापने की बात कही है वो 60 बरस के बाद भी समाप्त नहीं हुई है... और जो हालत हैं उसमें अगले और कई बरसों तक यह सम्भव भी नहीं होता दिखता!! अरुण जी इस बार अतिशयोक्ति (?) से बच रहा हूँ..

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  4. बिहारी भाई से सहमत। इस कविता की इससे अच्छी समीक्षा कुछ हो ही नहीं सकती।

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  5. Kuchh ilaaqe bahut aage nikal gaye...kuchh bahut pichhad gaye..saath barson se bhee adhik...shayad ek pooree sadee!

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  6. बहुत सुन्दर रचना ...
    आपकी पिछली पोस्ट भी लगभग इसी बात पे थी ...
    अच्छी बात है कि आप अपने गांव के बारे में इतना सोचते हैं ... भारत के ज्यादातर गांव के हालात यही है ...

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  7. कुछ भी कहने मे असमर्थ …………निशब्द कर दिया
    बिहारी जी से सहमत हूँ।

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  8. विचारणीय रचना ....न जाने कितने गाँव हैं जिन्होंने अभी तक बिजली की रोशनी नहीं देखी ...

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  9. यह त्रासद सच्चाई विकास के जगमगाहट और झिलमिलाहट भरे यात्रा के अंधेरे पक्षों को बखूबी उजागर करती है. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  10. sab ne wo sari baaten kah deen jo mere dilon dimaag me aa rahi theen....bahut si moolbhoot suvidhaon kee yojna bani par gaon tak nahi pahunchi...

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  11. पिछली कविता के भाव को और आगे बढ़ाती यह कविता। सड़क वाली कविता।

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  12. mera gaon bhi kuchh itna hi dur hai sir.......!!
    par bhi bhi, bas itntzaar hai....

    bahut bhawpurn kavita.....:)

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  13. रेल में सवार हो
    जाते हैं जो
    लौट कर नहीं आते
    तय नहीं कर पाते
    वापसी का सफ़र
    बहुत सुन्दर और मार्मिक चित्रण गाँव का.

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  14. देश के ६० बरस पर सटीक कटाक्ष करती रचना.

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  15. बहुत सुन्दर अरुण जी। आपकी रचनाएं उत्कर्ष की ओर अग्रसर हैं।

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  16. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  17. कटाक्ष करती प्रशंसनीय रचना - बधाई

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  18. ये साठ वर्षों का ही नहीं भावनाओं का भी सफ़र है

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