सोमवार, 22 नवंबर 2010

हीरक रोड


आजादी के
साठ  साल बाद
एक सड़क आयी
मेरे गाँव भी
जिस कम्पनी  ने
बनाया इसे
उसी के नाम पर
हो गया इसका नामकरण
'हीरक रोड'

हीरक रोड
से चल कर
आया मेरे गाँव में
मोबाइल फ़ोन
पाउच वाले शैम्पू, तेल,
कोल्ड ड्रिंक और
इसी सड़क के किनारे-किनारे
उग आयी दारु के
कई भट्टियाँ 


नहीं जो आया
इस सड़क से
वो था
हाई स्कूल
कालेज
प्राथमिक अस्पताल
बिजली के खम्भे
राशन, कैरोसिन  तेल
खाद-पानी-बीज

हीरक रोड
आयी मेरे गाँव में
नहीं आयी
जिसे आना चाहिए था
वास्तव में

इसी सड़क से
पलायन हुए
संस्कार भी

26 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो त्रासदी है भारत के ज्यादातर गाँव की……………बाकी सब मिल जायेगा मगर मूलभूत बुनियादी सुविधाओं का ही वहाँ सदा अभाव रहता है तो फिर संस्कार का अभाव क्यूँ ना होगा आखिर कब तक संस्कार अकेले ज़िन्दा रहेंगे…………????????

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  2. हीरक रोड
    आयी मेरे गाँव में
    नहीं आयी
    जिसे आना चाहिए था
    वास्तव में
    गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

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  3. SACHAI BAYAN KAR DI AAPNE ARUN JI..AAJ BHI JYATAR GAVO ME SUKH SUVIDHAO KE NAAM PAR KUCH BHI NAHI AUR LOGO KO JEVAN PURANI HI GATI SE CHAL RAHA HAI

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  4. इसी सड़क से
    पलायन हुए
    संस्कार भी
    कुछ न आये कोई बात नहीं पर संस्कार का पलायन ज्यादा दुखद है
    कमोबेश हर गाँव में है 'हीरक रोड' जिससे संस्कारों से पलायन हो रहा है

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  5. हीरक रोड
    आयी मेरे गाँव में
    नहीं आयी
    जिसे आना चाहिए था
    वास्तव में

    इसी सड़क से
    पलायन हुए
    संस्कार भी
    Aah!Kitna afsos hai in panktiyon me!

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  6. sundar.. aur haqiqat.. jis road se gaanv kee jarurat kaa samaan ayaa usi road se sanskriti aur aanv kaa palaayan bhi huva..

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  7. अंतिम पंक्तियाँ दिमाग पर असर करती है सुंदर रचना

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  8. नहीं जो आया
    इस सड़क से
    वो था
    हाई स्कूल
    कालेज
    प्राथमिक अस्पताल
    बिजली के खम्भे
    राशन, कैरोसिन तेल
    खाद-पानी-बीज
    aur
    isi sadak se palayan hue sanskaar bhi....bahut badhiyaa

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  9. अरुण बाबू रोड जल्दी ख़त्म हो गई. और लम्बी कहानी हो सकती है हीरक् रोड की

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  10. वह सब किया सड़क ने जो उसे नहीं करना चाहिये था। सुन्दर भाव।

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  11. विकास के नाम पर गाँवों की जिस तरह अस्मत लूटी गई है उसका ज्वलंत प्रमाण है आपकी यह कविता… गाँव की ओर आती हुई हर एक पक्की सड़क अपने साथ बुराइयोंका पका इंतज़ाम करके आई, लूट ले गई गाँव से उसकी मासूमियत और दे गई एक नशा मोबाईल, कोल्ड ड्रिंक्स और दारू का… जिस रास्ते शिक्षा और विकास आना था उस रास्ते अशिक्षा और अंधकार दाखिल हो गया.. अरूण जी आपकी नज़र की नज़र उतार लेने को जी करता है.. माता जी को मेरी तरफ़ से चरण स्पर्श के बाद अवश्य कहिएगा! कृपया इसे अतिशयोक्ति न समझें!!

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  12. इसी सड़क से
    पलायन हुए
    संस्कार भी.....

    अरुण जी..आपके भाव जो इस कविता के माध्यम से सामने आए है सच में बेहतरीन है...बहुत भावपूर्ण और सुंदर कविता ..सार्थक लेखनी के लिए बहुत बधाई

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  13. बहुत अच्छी सड़क जो विकास का संकेत है!

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  14. बहुत अच्छी लगी आपकी कविता अरुण जी।

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  15. @मानिक भाई
    आपसे सहमत हूँ कि कविता जल्दी ख़त्म हो गई... लेकिन अपने मकसद में कामयाब रही कि नहीं... ये बताएं..

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  16. @सलिल जी (चला बिहारी ब्लॉगर बनने )
    आपने जो टिप्पणी दी है अतिशयोक्ति सी ही लग रही है.. अपने गाँव को देख कर देश को देखने की कोशिश कर रहा हूँ.. वरना रौशनी तो यहाँ बहुत दिखाई दे रही लेकिन कहाँ पहुँच रही है मेरे गाँव.. अपनी बात कहने में यदि सक्षम रहू तभी मैं और मेरी कविता सार्थक होगी... अपना स्नेह बनायें रखें ..प्रेरणा मिलती है..

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  17. नहीं जो आया
    इस सड़क से
    वो था
    हाई स्कूल
    कालेज
    प्राथमिक अस्पताल
    बिजली के खम्भे
    राशन, कैरोसिन तेल
    खाद-पानी-बीज
    .........
    इसी सड़क से
    पलायन हुए
    संस्कार भी...
    सार्थक लेखन...बधाई.

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  18. आधुनिता की त्रासदी ... तरक्की का खोखलापन बताती प्रभावी रचना ...

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  19. रचना सुन्दर है ... अभिनव तरीके से बात कही गई है !

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  20. vikas to chal kar aaya us sadak se par vinash ka ahath pakad kar ,jo trasd hai....sarah bhasha gahre arth...

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  21. टिप्पणी पर प्रतिटिप्पणी करके आपने दुबारा मजबूर कर दिया… इसमें अतिशयोक्ति नहीं है… लगती अवश्य है... आपकी बात
    अपने गाँव को देख कर देश को देखने की कोशिश कर रहा हूँ.
    इसी नज़र की नज़र उतरने की बात की है मैंने. वर्ना गाँव से शहर आते ही, शहर की चकाचौंध में लोगों की नज़र बदल जाती है, आपने बचाए रखी है, यह संस्कारोंके प्रति कृतज्ञता है!! अतिशयोक्ति नहीं!! आपके प्रत्युत्तर का आभार!

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  22. नहीं जो आया
    इस सड़क से
    वो था
    हाई स्कूल
    कालेज
    प्राथमिक अस्पताल
    बिजली के खम्भे
    राशन, कैरोसिन तेल
    खाद-पानी-बीज
    एक दम सामयिक रचना ...सोचने पर मजबूर करती हुई ...धन्यवाद

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  23. प्रगति के नाम पर हावी होती आधुनिकता

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