मंगलवार, 30 नवंबर 2010

गरीबी का मैग्नेटिज्म

अपने
१४ मंजिले फ्लैट की
बालकनी में खड़ा
वह आदमी
जो उड़ा रहा है
सिगरेट के धुंए  का छल्ला
तेजी से चहलकदमी करते हुए
किसी फिल्म के किरदार की तरह
लगता है आकर्षक
सड़क से

भीतर उसके भी
चल रहा होता है  ऊपापोह 
क्योंकि ई एम आई का चक्र
ठेले और रिक्शे के पहिये के चक्र से
नहीं होता भिन्न
स्टाक के उतार-चढाव का बोझ
किसी कुली के  माथे पर ६० किलो के बोझ से
कतई भी नहीं होता कम

जब सो रहा होता है
फुटपाथ  पर कोई चैन से
आकर्षक लगने वाला वह आदमी
गिन रहा होता है तारों में
बढती हुई  बच्चों की फीस
और आया हुआ बिजली का बिल

सुबह वह आदमी
एम्टास-ए टी की गोली लेगा
नियंत्रित करने को
अपना  और देश का रक्तचाप
ब्रेक-फास्ट  में
और खिल उठेगा
नए बढ़ते भारत का चेहरा
दिन भर के लिए

गरीबी रेखा के
ऊपर भी है अदृश्य गरीबी
जिससे चहल पहल है
बाज़ारों में
जहाँ गरीबी रेखा के
नीचे वाली गरीबी
पैदा करती है आज भी संवेदना
ऊपर की अदृश्य गरीबी
महिमामंडित हो
आकर्षित करती है
ऍफ़ ड़ी आई विश्वभर से .

35 टिप्‍पणियां:

  1. ्क्या खूब लिखा है……………शब्दहीन कर दिया……………अब कहने को कुछ बचा ही नही मेरे पास्………………बेहतरीन अभिव्यक्ति।

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  2. शब्‍दों का धोबी पछाड, विद्रूप पर तगड़ा प्रहार, धन्‍यवाद.

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  3. सही लिखा गरीबी की रेखा से नीचे जीने वालोंन की गरीबी उनके घर,कपडो और शक्ल से दिखती है सबको.और सबकी हमदर्दी भी होती है इनके साथ.पर ऊंची अट्टालिकाओं में रहने वाले इन लोगो की ये 'अलग'-सी गरीबी नही दिखती किसी को.माद्यम वर्ग की तरह जो कह भी नही सकता,हाथ फैला भी नही सकता.
    अट्टालिकाओ में जीने वालों का वर्णन जैसे...चमड़ी पर ब्लेड चला दी किसी ने.अच्छा लिखते हैं आप.

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  4. आज के हालात को बखूबी बयां करती आपकी ये रचना बहुत अच्छी है...वाह

    नीरज

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  5. गरीबी रेखा के
    ऊपर भी है अदृश्य गरीबी
    जिससे चहल पहल है
    बाज़ारों में
    जहाँ गरीबी रेखा के
    नीचे वाली गरीबी
    पैदा करती है आज भी संवेदना
    ऊपर की अदृश्य गरीबी
    महिमामंडित हो
    आकर्षित करती है
    ऍफ़ ड़ी आई विश्वभर से

    बहुत ही दमदार कविता...बधाई।

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  6. जब सो रहा होता है
    फुटपाथ पर कोई चैन से
    आकर्षक लगने वाला वह आदमी
    गिन रहा होता है तारों में
    बढती हुई बच्चों की फीस
    और आया हुआ बिजली का बिल
    ye hai aaj ka khula bhayavah sach

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  7. आपकी रचनाएँ हमेश दोनों वर्गों की भिन्ताएं प्रस्तुत करतीं हैं... मुझे "फ़्लाईओवर के नीचे" भी बहुत अच्छे लगी थे... और ये भी बहुत उम्दा है...
    कोशिश करूंगी आपकी रचनाओं से कुछ सीख पाऊं...

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  8. सच है, यही कहलाती है अदृश्य गरीबी। दूसरी ओर चैन से सोते आदमी का राजयोग भी।

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  9. अरुण जी आपकी काव्‍य यात्रा के साथ साथ आपका काव्‍य फलक भी निरंतर व्‍यापक होता गया है। इस कविता में आप अपना ही पुराना प्रतिमान तोड़ते नजर आते हैं। कविता में संवेदना का विस्तार व्‍यापक रूप से देखा जा सकता है।
    आपने साधारण आदमी पर असाधारण कविता रची है। इस बदलते समय में सभ्‍यता की ऊपरी चमक दमक के भीतर उजड़ती सभ्‍यता, सूखती और सिकुड़ती संस्‍कृति की इस त्रासद स्थिति में आपका कवि मन का उदात्त को ही नहीं, साधारण को भी अपनी कविता में ग्रहण करता है। यही आमजन सभ्‍यता और संस्‍कृति की नींव मजबूत रखते हैं। इस कविता के केंद्र में साधारण आदमी है और उसके चारो ओर कविता घूमती है। पूरी कविता एक सधी हुई गति में चलती है।
    बधाई एक उत्कृष्ट रचना के लिए।

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  10. गरीबी रेखा के
    ऊपर भी है अदृश्य गरीबी
    जिससे चहल पहल है
    बाज़ारों में
    जहाँ गरीबी रेखा के
    नीचे वाली गरीबी
    पैदा करती है आज भी संवेदना
    ऊपर की अदृश्य गरीबी
    महिमामंडित हो
    आकर्षित करती है

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  11. सामयिक कविता ..ये गरीबी कहीं नहीं जाती और कोई उससे उबर नहीं पाता

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  12. जब सो रहा होता है
    फुटपाथ पर कोई चैन से
    आकर्षक लगने वाला वह आदमी
    गिन रहा होता है तारों में
    बढती हुई बच्चों की फीस
    और आया हुआ बिजली का बिल

    कितनी सोचनीय स्तिथि है ..क्या किया जा सकता है ....बहुत सुंदर तरीके से भावों को अभिव्यक्ति दी है ....सार्थक पोस्ट ...शुक्रिया

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  13. चलो फ्लाई ओवर से निकल कर सडक और बालकनी तक तो पहुंचे .........बेहतरीन भावों से सजी मन को व्यथित करती प्रस्तुति

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  14. अद्रश्य गरीबी |
    मध्यम वर्ग त्रासदी बहुत ही सत्यता के साथ पेश करती सशक्त रचना |

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  15. गरीबी रेखा के
    ऊपर भी है अदृश्य गरीबी.....सच है....
    बेहतरीन अभिव्यक्ति...

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  16. ई एम आई, बच्चों की फीस व बिजली-बिल जैसी सामान्य चिंताओं के माध्यम से गरीबी रेखा के उपर के आदमी की गरीबी का बेहतरीन चित्रण.

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  17. बहुत सुन्दर ... कहीं माली हालत खराब तो कहीं मानसिक हालत ... दोनों ही हाल में इंसान गरीब है ... न जाने अमीर कौन है ..

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  18. बहुत khoob ... sab के apne apne dard hain .. apni apni pareshaani ... baakhoobi baandha है इस e em aai के chakkar को इस रचना me .....

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  19. कविता में यथार्थ को बड़ी ही सजीवता से चित्रित किया गया है !
    नए प्रतिमान बड़े ही प्रभावी बनकर उभरें हैं !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  20. बहुत ही सशक्त रचना...वो चौदहवीं मंजिल वाला आदमी भी चिंताओं के रेखा जाल में उतना ही उलझा हुआ है...बस उसकी गरीबी दिखती नहीं.

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  21. बहुत सुन्दर शब्द संयोजन .... गहरी ..संवेदनशील अभिव्यक्ति .... अदृश्य गरीबी ... आह! आपको बधाई ..

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  22. अरुण जी बहुत ही भाव पूर्ण रचना... बिल्कुल सही कहा आपने जैसे की बाहर की चमक बस अंदर की कमी को छिपा लेती है

    .

    .

    उपेन्द्र

    सृजन - शिखर पर ( राजीव दीक्षित जी का जाना )

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  23. बहुत सुन्दर. एक मर्मभेदी सत्य. प्रस्तुत कविता पढ़ते हुए दसवीं कक्षा में पढी राजा राधिकारमण प्रसाद की "दरिद्रनारायण" बरबस याद आ गयी......... !! धन्यवाद !!!

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  24. ek dum sahi kahaa aapne ... yah ameeri ki gareebi ... gareebi se kam khatarnak hoti hai ...aur middle class aadmi is ameeri wali gareebi ke neeche sabse jayada mara ja raha hai ...ek jaroori vishay par umda kavita..... overbridge wali kavita bhi aaj hi padhi wo bhi bahut pasand aayi...

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  25. ऊपर की अदृश्य गरीबी
    महिमामंडित हो
    आकर्षित करती है
    ऍफ़ ड़ी आई विश्वभर से

    सोलोह आने सत्य वचन...
    गरीबी लाईन के उपर की गरीबी ज्यादा विभात्स्व है.

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  26. जब सो रहा होता है
    फुटपाथ पर कोई चैन से
    आकर्षक लगने वाला वह आदमी
    गिन रहा होता है तारों में
    बढती हुई बच्चों की फीस
    और आया हुआ बिजली का बिल
    आज का सच यही है। असल मे फूटपाथ पर सोने वाले संवेदनाओं से इतने गरीब नही होते जितना आज का अमीर आदमी। हर वक्त पैसे की भागम भाग, संवेदनहीनता। बहुत गहरे भाव हैं। बधाई ।

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  27. क्या तस्वीर प्रस्तुत की है आपने एक बंधुआ मज़दूर की!!कंक्रीट के खेतों पर काम करता ये हैरी अपनी सारी ज़िंदगी कर्ज़ के बोझ तले दबा रहता है और ईएमआई चुकाता रहता है..घर का सारा सामान गिरवी... आज के बंधुआ मज़दूर सिगरेट के छल्लों में जिगर के छाले छिपाते हैं..
    अरुण जी विलम्ब के लिए खेद!!!

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  28. बहुत खूब ...आपकी रचनाओं से गहरी संवेदनशीलता उजागर है ! हार्दिक शुभकामनायें !

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  29. गरीबी रेखा के
    ऊपर भी है अदृश्य गरीबी
    जिससे चहल पहल है
    बाज़ारों में
    जहाँ गरीबी रेखा के
    नीचे वाली गरीबी
    पैदा करती है आज भी संवेदना
    ऊपर की अदृश्य गरीबी
    महिमामंडित हो
    आकर्षित करती है
    ऍफ़ ड़ी आई विश्वभर से .
    ....दमदार कविता
    खासकर इन पंक्तियों ने रचना को एक अलग ही ऊँचाइयों पर पहुंचा दिया है शब्द नहीं हैं इनकी तारीफ के लिए मेरे पास...बहुत सुन्दर..

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  30. सबके दिल में खुशियॉं देखीं सबके देखे ग़म
    अपने ग़म ज्‍यादह दिखते हैं दूजे के कुछ कम।

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