गुरुवार, 14 मई 2015

हताश समय



दरवाज़े सब हैं 
बंद 
खिड़कियों पर 
मढ़ दिए गए हैं 
शीशे 

हवाओं के लिए भी 
नहीं है कोई सुराख़ 
और रौशनी कृत्रिम हो गई है 

आसन्न है अंत 
हताश समय है यह 

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