मंगलवार, 5 मई 2015

सुबह सुबह



उठ रहे हैं 
फुटपाथ से लोग 
जिनके घर नहीं हैं 
सुबह होने से पहले 
उनके लिए होता है भोर 

गाड़ियों का शोर 
थोड़ा बढ़ गया है 
बढ़ गई है 
चहलकदमियां 
जीवन की 
जो सोई थी देर से 
लेकिन जग गई है जल्दी 

होर्डिंग पर टंगी लड़की 
ओस में नहाकर 
अभी अभी उतरी है 
और कूड़ा बीनने वाली लड़की 
नहाईं नहीं कई दिनों से 

अखबार वाला साइकिल हांकता है 
जल्दी जल्दी 
जितनी तेज़ी से चलती है छापे की मशीन 
कहाँ कभी किसी ने बनाया उसे 
पहले पन्ने का आदमी 
जबकि पहला आदमी है वह 
जो सूंघता है हर रोज़ 
स्याही की गंध , खबरों की शक्ल में 

चाय की पहली खेप की गंध 
दूर तक जाती है 
और 
एक चुप्पी छा जाती है 
हमारे बीच 
सुनने की कोशिश करते हैं 
चिड़ियों के झुण्ड का समवेत स्वर 
तभी 
म्युनिस्पलिटी की गाड़ी 
गड गड कर गुज़रती है 
मरे हुए जानवर को लेकर 

चुप्पी टूटती है 
टूटता है बहुत कुछ 
सुबह सुबह 

4 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ कभी किसी ने बनाया उसे
    पहले पन्ने का आदमी
    जबकि पहला आदमी है वह
    जो सूंघता है हर रोज़
    स्याही की गंध , खबरों की शक्ल में

    श्रम और सम्मान में विरोधाभास के प्रति संवेदना प्रदर्शित करती अच्छी रचना ।

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  2. शब्दों से बना एक चलचित्र
    आभार

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  3. सुबह सुबह' यह दो शब्द ही बहुत सुंदर चुने .....

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