गुरुवार, 21 मई 2015

घुटता हुआ समय




अभी अभी 
मैं मिल कर आया हूँ 
एक पागल विज्ञानिक से 
जो देश के एक प्रयोगशाला में 
बनाता हुआ एक तकनीक 
चुक गया 
और सात समंदर पार से आकर एक बाज 
छा गया देश पर 

अभी अभी 
मैं मिलकर आया हूँ 
एक पागल किसान से 
जो खेतो में हत लिया है 
प्राण 
और सात समंदर पार से आकर एक बीज 
अंकुरा रहा है विषवेल खेतों में 

अभी अभी 
मैं मिलकर आया हूँ 
एक पागल कामरेड से 
जो भट्टी में डाल दिया गया था 
बड़ी कंपनी की बड़ी फैक्ट्री बड़े फर्नेस में  
और सात समंदर पार से आयातित नीतियां 
धमका रहा था 
कांट्रैक्ट मजदूरों को 


अभी अभी 
मैं मिल कर आया हूँ 
घुटते हुए समय से ! 


6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (22-05-2015) को "उम्र के विभाजन और तुम्हारी कुंठित सोच" {चर्चा - 1983} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  2. हाँ कुछ पागलों के होने से ही समय बचा हुआ भी लगता है कहीं थोड़ा सा ।

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  3. सटीक चोट करती सार्थक प्रस्तुति

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  4. अभी अभी
    मैं मिल कर आया हूँ
    घुटते हुए समय से ............sach hai

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  5. वाह बहुत खूब...एक सार्थक तहरीर...

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