सोमवार, 18 मई 2015

जब नहीं होता कहने को कुछ

जब नहीं होता 
कहने को कुछ 
तब भी 
चल रही होती है 
अकेली एक नदी 
सागर की ओर 
लौट रही होती है 
गौरैया 
लेकर एक दाना 
अपने चोंच में 

कोई किसान 
रोप रहा होता है 
एक बीज 
विश्वास से 
और कुछ बच्चे 
बना रहे होते हैं 
उगते सूरज का चित्र 

उंगलिया लिखती हैं 
मिटटी पर 
किसी का नाम 
जब नहीं होता
कहने को कुछ ! 

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह अब तो मेरे पास भी नहीं बचा कुछ कहने को

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  2. सुन्दर अहसास लिए अच्छी रचना।

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  3. यह कविता बहुत अच्छी बन पड़ी है अरुण जी . गुप्त जी ने भी कहा है -कोई पास न रहने पर भी जन मन मौन नही रहता ..
    कृपया उत्तर दें .

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, रावण का ज्ञान - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति.बहुत शानदार भावसंयोजन .आपको बधाई
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  6. वाह सटीक।एकदम सही कहा अपने
    जब नहीं होता
    कहने को कुछ
    तब भी कहने को होता तो है कुछ
    ये मन है आखिर चुप बैठता कहाँ है
    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  7. घट भरा हो तो पानी उँडेलना मुश्किल ,अंदर ही अंदर घूमता- टकराता - मंथन चल रहा हो जैसे .बाहर आने की राह नहीं मिलती .

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  8. तब भी बहुत कुछ हो रहा होता है।


    गहन और सूक्ष्म अनुभूतियां।

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