तोड़ दो
मेरे हाथ
क्योंकि ये
लहराना चाहते हैं
मुट्ठी
तुम्हारे विरोध में
उन सबके विरोध में
जो हैं मिटटी, हवा के विरोध में
तोड़ दो
मेरी टाँगे
क्योंकि ये
चलना चाहते हैं
संसद के दरवाज़े तक
और खटखटाना चाहते हैं
बंद दरवाज़े
जहाँ बन रहे हैं
मेरे खिलाफ नियम
मेरी जिह्ह्वा
काट लो
क्योंकि यह लगाना चाहती हैं
नारे तुम्हारे खिलाफ
तुम्हारी कुनीतियों के खिलाफ
जो छीन रही रही
मेरी ज़मीन , मेरे जंगल
मेरे लोग
मेरी आँखे
फोड़ दो
जो देखना चाहती हैं
सत्ता से
पूँजी की बेदखली
फिर भी
लहराएगा हाथ
भिन्चेगा मुट्ठियाँ,
कदमो के शोर से
हिल देगा संसद का परिसर
और बिना जिह्वा भी
नारे से गूँज उठेगा
राजपथ।