गुरुवार, 20 मई 2010

बस्तर मेरा नहीं

१.
पत्तों का
पत्तों से संवाद
थम गया है
जंगल में
जब से
बूटों का पहरा
पड़ गया है

२.
पत्तों ने
खो दिए हैं
अपने रंग
जब से
फ़ैली है
जंगल में
बारूदी गंध

३.
शाखों पर
ठिठकी कोयल
हो गई है
मौन
जब से
जंगल को
वे रहे हैं
रौंध

४.
कोख में
जो पडा है
सोना
साजिश कर
शांति है
उसी ने छीना

५.
मेरी धरती
मेरा जंगल
फिर भी
नहीं है
मेरा बिस्तर
मेरा 'बस्तर'

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

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  2. बहुत से गहरे एहसास लिए है आपकी रचना ...

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  3. सरोकार शीर्षक को सार्थक करती सामयिक घटना को आधार बनाकर लिखी गयी यह रचना अपने आप में सार्वभौमिक एवं समर्थ रचना है .

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  4. Sunil Gajjani jee ne emial se kaha : ''bastar '' ke panchon rang ko alag alag tulikan ke bhav bhare hai , choti si kavita kitna kuch kah deti hai , ye in kavitaon me nazar aa raha hai

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  5. बस्तर के दर्द को आपने सार्थक अभिव्यक्ति दी है।
    सचमुच बस्तर के जो हालात हैं, वे चिंताजनक हैं। हम आपकी चिंताओं में आपके साथ हैं। हमारी दुआ है कि जल्द ही बस्तर फिर आपका आप सबका हो जाए।

    क्या हमें ब्लॉग संरक्षक की ज़रूरत है?
    नारीवाद के विरोध में खाप पंचायतों का वैज्ञानिक अस्त्र।

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  6. अरुण जी सच कहूँ तो आपकी क्षणिकाओं को महसूस कर आँख भर आयी। पिछले दिनों एक साल के अंतराल के बाद अपने घर बचेली गया था। मुझे उन जंगलों, उन नालों उन इमली की डालों और तेन्दू के पेडों तक जाने से रोक दिया गया जहाँ मैंने घुटने फोडे और खडा होना सीखा था। अपने ही घर से बारूद की गंध नें हमें बेदखल कर दिया है। आपकी अंतिम क्षणिका नें सिहरन पैदा कर दी है। अहसास को इतने प्रभावी शब्द देने का आभार।

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  7. दर्द जब कलम से बहा है तो ऑंखें भर आयीं. जहाँ शरीर, दिल, मन और भावनाओं से बहा होगा वहां कैसा हृदय विदारक दृश्य रहा होगा !!!!

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  8. ek sarthak kavita.........:)
    dard ka anubhav vastav me hota hai, aapke har pankti se.......

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  9. पत्तों का
    पत्तों से संवाद
    थम गया है
    जंगल में
    जब से
    बूटों का पहरा
    पड़ गया है
    waah

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  10. पत्तों ने
    खो दिए हैं
    अपने रंग
    जब से
    फ़ैली है
    जंगल में
    बारूदी गंध ...

    Vah .. kamaal ki kshanikaayen hain ...

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  11. सारी क्षनिकाएं बहुत लाजवाब हैं....दर्द साफ़ नज़र आता है..

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  12. aapki kshanika ne jata diya ki dard ka anubhav karne ke liye dard sahana jaroori nahi hai dard mahsoosna jaroori hai,aur aap me vo samvedanshelata hai ki aap doosron ke dard ko mahsoos kar use apna dard bana kar vyakt kar pate hai.aapki ye samvedansheelta barkarar rahe yahi kamna hai.....

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  13. मेरी धरती
    मेरा जंगल
    फिर भी
    नहीं है
    मेरा बिस्तर
    मेरा 'बस्तर'
    canvas par utara gaya aik behad marmik avam yatharth ke kareeb se gujarati abhivyakti.jangal ka dukh samajhne ke liye dhanywad.par booton keaawaj ki vivashta ko bhi dekhne ka pryas karte to bahut achcha hota.thanks.

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