रविवार, 2 मई 2010

प्रश्न काल

भाई साहब
ए़क स्कूल चला था
मेरे गाँव के लिए
दिल्ली से
कोई साठ साल पहले
और
पीढियां गुजर गईं
स्कूल के इन्तजार में
रौशनी से महरूम

खबर
नहीं बन सका
स्कूल का गुम जाना
कभी किसी
अखबार में
कोई रपट नहीं आयी
कभी धरने नहीं हुए
किसी प्रेस वार्ता में
कोई असहज नहीं हुआ
क्योकि
यह प्रश्न पूछा ही नहीं गया

यही नहीं
भाई साहब
ए़क अस्पताल भी
चला था
मेरी गाँव की ओर
और
सुना है
अभी भी
वो रास्ते में है
लेकिन
इन साठ सालों में
मेरी हजारों बहने
जचगी के दौरान
पहुँच गई ऊपर
लेकिन
नहीं पहुँच सका
अस्पताल मेरे गाँव

ना तो
अस्पताल का नहीं पहुंचना
खबर बन सका
ना ही
मेरी बहनों की मौत

कभी किसी
पत्रकार ने
नहीं उछाला जूता
किसी
मंत्री
सांसद
विधायक
कलेक्टर के आगे
ना ही
इस पर हुआ कभी
संसद में वाक्आउट

ना ही
कभी
पूछा गया
संसद में कोई प्रश्न
प्रश्न काल में ।

है ना
प्रश्न काल यह
मेरे गाँव के लिए !

19 टिप्‍पणियां:

  1. अरुण बाबू आपकी व्यंग शैली बहुत अच्छे लगी.
    सादर,

    माणिक
    आकाशवाणी ,स्पिक मैके और अध्यापन से जुड़ाव
    अपनी माटी
    माणिकनामा

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  2. ना तो
    अस्पताल का नहीं पहुंचना
    खबर बन सका
    ना ही
    मेरी बहनों की मौत
    ........
    ये खबर नहीं, दुर्घटना है ! जिस दर्द को खुद ही पीना है

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  3. है ना
    प्रश्न काल यह
    मेरे गाँव के लिए !
    भारत के तमाम गाँवों के प्रश्नकाल समाचारों और खबरों तक नहीं पहुँच पाते
    अरूण जी आप बहुत अच्छा लिखते है

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  4. है ना
    प्रश्न काल यह
    मेरे गाँव के लिए !....

    बेहतर रचना...आभार...

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  5. यह प्रश्न तो कई सारे लोगो का काल होना चाहिए ,वो कई सारे लोग गाँव के नहीं इस व्यवस्था के हों
    www.sahitya.merasamast.com

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  6. बहुत करारा कटाक्ष!!


    और जो गांव से दिल्ली के लिए चला था, उसको काहे बार बार दिल्ली भेज देते हैं, उससे मांगो हिसाब बैठाल कर..

    अपने आप स्कूल भी आयेगा और अस्पताल भी...सब इनकी ही नाकेबंदी में फंसे हैं और हम इन्हीं को बार बार चुन चुन कर दिल्ली भेज देते हैं और ये तो चले आते हैं फिर ५ साल में.

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  7. arun ji,
    behad sashakt rachna. desh ki 80% aabadi gaanw main hai, aur unki ye traasadi. kataksh ke sath hin aam aawaam ki vyathaa bhi. likhte rahein bahut shubhkaamnayen.

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  8. अभी भी न जाने कितने ऐसे ही गाँव है जिनके वास्ते शहर से चले स्कूल और अस्पताल रास्ते मे ब्यूरोक्रेसी के ट्रैफ़िक-जाम मे ही फ़ँसे हैं..
    बढ़िया कविता!!

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  9. yahi to bharat ki duvidha hai yaha jo kaam hona chahiye filo me hi ho pata hai villages me to

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  10. प्रश्न काल एक सटीक व्यंग्य है ,आपसे ऐसी ही कविता की उम्मीद रहती है

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  11. बेहतरीन व्यंग्य। hamare desh ki taraki ka rasta hamare gaon se ho kar guzarta hai.... par aaj azadi ke saath saal baad bhi hum ye samjh nahi paye... kheti pradhan desh jatiwaad pradhan desh ban kar reh gaya...

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  12. उफ्फ्फ !!!! लाजवाब ,कमाल है !!!!!!!!!!!!!!बहुत जबरदस्त अभिव्यक्ति, अनुत्तरित प्रश्न. प्रश्नकाल पर जवाब मांगने वाले वही देने वाले वही सब कुछ तो यथावत है फिर प्रशनकाल कैसा? यहाँ तो जीवन पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया

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  13. फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

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  14. समाज की स्थिति पर करारा व्यंग ....

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