सोमवार, 24 अगस्त 2026

कास के फूल

कास  के घास में है
एक कसक
वह फुसफुसाती है हौले हौले
हवा के कानों में ।

कुछ चाहती है वह 
पुकारती है वह 
गाती  है और 
अपने मन की बातें बताती है 
आसमान में चमकते तारों को 
नीरव अंधेरे में ! 

बादल सुनते हैं;
बदल जवाब देते हैं; 
उतरते हैं धीरे-धीरे बारिश के संग 
 बादल भिगो देता है 
कास के घास के चेहरे को 
लम्बे लम्बे सफ़ेद सुनहरे फूल 
फूट पड़ते उसकी छाती पर 

बढ जाता है
नदी के कछार का सौंदर्य ! 


5 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति सर।
    इतनी जल्दी कास खिल रहे क्या
    अभी तो भादो बचा हुआ है पूरा।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २५ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. प्रकृति के मौन में कितना कुछ घट जाता है और एक संवेदनशील ह्रदय सुन लेता है!!

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