कास के घास में है
एक कसक
वह फुसफुसाती है हौले हौले
हवा के कानों में ।
कुछ चाहती है वह
पुकारती है वह
गाती है और
अपने मन की बातें बताती है
आसमान में चमकते तारों को
नीरव अंधेरे में !
बादल सुनते हैं;
बदल जवाब देते हैं;
उतरते हैं धीरे-धीरे बारिश के संग
बादल भिगो देता है
कास के घास के चेहरे को
लम्बे लम्बे सफ़ेद सुनहरे फूल
फूट पड़ते उसकी छाती पर
बढ जाता है
नदी के कछार का सौंदर्य !
नदी के कछार का सौंदर्य !
वाह
जवाब देंहटाएंसुंदर अभिव्यक्ति सर।
जवाब देंहटाएंइतनी जल्दी कास खिल रहे क्या
अभी तो भादो बचा हुआ है पूरा।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २५ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंआभार
वंदन
वाह! बहुत सुंदर।
जवाब देंहटाएंप्रकृति के मौन में कितना कुछ घट जाता है और एक संवेदनशील ह्रदय सुन लेता है!!
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