अमरीकी ब्लैक और जन सरोकारों के कवि वेंडोलिन ब्रुक्स की एक कविता " ट्रुथ" का अनुवाद
सत्य
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-वेंडोलिन ब्रुक्स
और सदियों के लम्बे अन्धकार के बाद
यदि कभी सूरज सामने आ जाता है
कैसे करेंगे हम उसका स्वागत ?
क्या हम उससे भयभीत नहीं होंगे ?
क्या हम उससे डरेंगे नहीं ?
बात सही है कि
हम उसके लिए रोये हैं
हमने की हैं प्रार्थनाएं
इन तमाम काली रातों से भरे युग में
कैसा लगेगा यदि किसी उजाले से भरी सुबह
नींद खुले हमारे दरवाजों पर पड़े
सदियों से मोटी जंजीरों पर
रोशनी के प्रबल प्रहार के स्वर से
क्या हम आश्चर्य से चौंक नहीं जायेंगे ?
क्या हम भाग नहीं खड़े हो जायेंगे
अपने पुराने परिचित खोल में
हे वह कितनी ही धुंध और अँधेरे से ही
भरा क्यों न हो?
अनभिज्ञता में
चैन की नींद में पड़े रहना
क्या इतना सुकून भरा है ?
गहन अन्धकार की चादर
पड़ी है हमारी आँखों पर .
(अनुवाद : अरुण चन्द्र रॉय )
गुरुवार, 13 दिसंबर 2018
शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018
धीरे धीरे मरना
ब्राजील की प्रसिद्द कवयित्री मार्था मेडिएरोस की एक कविता -
धीरे धीरे मरना
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वह जो बन जाता है आदत का दास
जो हर दिन पालन करता है एक ही दिनचर्या
जो नहीं बदलता है कभी अपना ब्रांड
जो नहीं उठता है किसी भी प्रकार का खतरा और नहीं बदलता है अपने कपड़ों का रंग
जो उन लोगों से बात नहीं करता जिन्हें वह नहीं जानता
मर जाता है धीरे धीरे
जो हर दिन पालन करता है एक ही दिनचर्या
जो नहीं बदलता है कभी अपना ब्रांड
जो नहीं उठता है किसी भी प्रकार का खतरा और नहीं बदलता है अपने कपड़ों का रंग
जो उन लोगों से बात नहीं करता जिन्हें वह नहीं जानता
मर जाता है धीरे धीरे
वह जो टेलीविजन को बना लेता है अपना गुरु
मर जाता है धीरे धीरे .
मर जाता है धीरे धीरे .
वह जो छोड़ देता है जिजीविषा
जो चाहता है केवल सफेद और काला
और भावनाओं के भंवर के बीच केन्द्रित रहता है "मैं" पर,
जो जिसकी आंखों में अनुपस्थित है चमक
अनुपस्थित है अंगड़ाइयों में मुस्कान,
संघर्ष और भावनाओं में दिल
मर जाता है धीरे धीरे .
जो चाहता है केवल सफेद और काला
और भावनाओं के भंवर के बीच केन्द्रित रहता है "मैं" पर,
जो जिसकी आंखों में अनुपस्थित है चमक
अनुपस्थित है अंगड़ाइयों में मुस्कान,
संघर्ष और भावनाओं में दिल
मर जाता है धीरे धीरे .
वह जो अपने आसपास चीजों को अधिक नहीं बदलता
जो हर काम से रहता है नाखुश
जो अनिश्चितता के लिए निश्चितता का खतरा नहीं उठाता
बंधे-बंधाए स्वप्न को पकडे रखता है
जो अपने जीवन में एक बारे बेफिक्री से किसी अच्छी सलाह को अनदेखा नहीं करता
मर जाता है धीरे धीरे.
जो हर काम से रहता है नाखुश
जो अनिश्चितता के लिए निश्चितता का खतरा नहीं उठाता
बंधे-बंधाए स्वप्न को पकडे रखता है
जो अपने जीवन में एक बारे बेफिक्री से किसी अच्छी सलाह को अनदेखा नहीं करता
मर जाता है धीरे धीरे.
वह जो नहीं करता है यात्रायें
जो नहीं पढता नई किताबें
जो नहीं सुनता है संगीत
जो स्वयं से नहीं रहता खुश
मर जाता है धीरे.
जो नहीं पढता नई किताबें
जो नहीं सुनता है संगीत
जो स्वयं से नहीं रहता खुश
मर जाता है धीरे.
वह जो धीरे-धीरे अपने आत्म-प्यार को कर देता है नष्ट
जो अनुमति नहीं देता किसी को अपनी मदद करने की
जो दिन बिताता है अपने दुर्भाग्य और मूसलाधार बारिश की शिकायत करने में
मर जाता है धीरे धीरे
जो अनुमति नहीं देता किसी को अपनी मदद करने की
जो दिन बिताता है अपने दुर्भाग्य और मूसलाधार बारिश की शिकायत करने में
मर जाता है धीरे धीरे
वह जो किसी कार्य को छोड़ देता है शुरू करने से पूर्व
जो उन विषयों पर प्रश्न नहीं पूछता जिन्हें वह नहीं जानता
जो उन प्रश्नों का उत्तर नहीं देता जिन्हें वह जाता है
मर जाता है धीरे धीरे
जो उन विषयों पर प्रश्न नहीं पूछता जिन्हें वह नहीं जानता
जो उन प्रश्नों का उत्तर नहीं देता जिन्हें वह जाता है
मर जाता है धीरे धीरे
तिल तिल मरने से बचने के लिए
खुद को याद दिलाइये कि जिंदा रहना नहीं है महज साँसे गिनना
कुछ कोशिशे भी जरुरी हैं
खुद को याद दिलाइये कि जिंदा रहना नहीं है महज साँसे गिनना
कुछ कोशिशे भी जरुरी हैं
अनन्य ख़ुशी के लिए
केवल आवश्यक है धैर्य और जिजीविषा .
केवल आवश्यक है धैर्य और जिजीविषा .
(अंग्रेजी से अनुवाद : अरुण चन्द्र रॉय )
बुधवार, 3 अक्टूबर 2018
गोल
ईश्वर ने
दुनिया गोल बनाई
उन्होंने सूरज को भी
गोल बनाया
चाँद भी गोल है
और जिसदिन दिखता है पूरा गोल
लगता है वह सबसे सुन्दर
गोल चेहरा बच्चो का होता है
जब उनमे नहीं भरा होता है
दुनियावी बाते, झूठ और मक्कारी
घृणा और द्वेष
हिंसा, प्रतिहिंसा और क्रोध
जलते हुए दीप की आभा भी
फैलती है गोलाकार में
सपनों का यदि कोई आकार होता तो
होता वह वृताकार ही
रास्ते जो गोल चलते हैं
मंजिल की आपाधापी में नहीं रहते
ईश्वर की बनाई इस गोल दुनिया में
कहाँ रह गया है कुछ भी गोल !
दुनिया गोल बनाई
उन्होंने सूरज को भी
गोल बनाया
चाँद भी गोल है
और जिसदिन दिखता है पूरा गोल
लगता है वह सबसे सुन्दर
गोल चेहरा बच्चो का होता है
जब उनमे नहीं भरा होता है
दुनियावी बाते, झूठ और मक्कारी
घृणा और द्वेष
हिंसा, प्रतिहिंसा और क्रोध
जलते हुए दीप की आभा भी
फैलती है गोलाकार में
सपनों का यदि कोई आकार होता तो
होता वह वृताकार ही
रास्ते जो गोल चलते हैं
मंजिल की आपाधापी में नहीं रहते
ईश्वर की बनाई इस गोल दुनिया में
कहाँ रह गया है कुछ भी गोल !
सोमवार, 24 सितंबर 2018
मरने के इन्तजार में एक दिन
जिस दिन
मैं मर जाऊंगा
घर के सामने वाला पेड़
कट जाएगा
उजड़ जाएंगे
कई जोड़े घोसले
उनपर नहीं चहचहाएंगी
गौरैया मैना
गिलहरियां भी
सुबह से शाम तक
अटखेलियां नहीं करेंगी
कोई नहीं रखेगा इन चिड़ियों के दाना और पानी
अपनी व्यस्तता से निकाल कर दो पल
पहली मंजिल की बैठकखाने की खिड़कियाँ
जहाँ अभी पहुँचती है पेड़ की शाखा
वहां सुबह से शाम तक रहा करेगा
उज्जड रौशनी
ऐसा कहते हैं घरवाले
मेरी पीठ के पीछे
इसी शाखा की वजह से
बैठकखाने में नहीं लग पा रहा है
वातानुकूलन यन्त्र
मेरी गोद में उछल कर कहता है
मेरी सबसे छोटी पोती।
जैसे मेरे मरने के बाद नीचे नहीं आया करेगा
पीला कुत्ता
जिसे मैंने चुपके से गिरा दिया करता हूँ
अपने हिस्से की रोटी से एक कौर
मर जाएगा मेरे और कुत्ते के बीच एक अनाम सम्बन्ध
झूठ कहते हैं कि कोई मरता है अकेला
जबकि जब भी कोई मरता है
उसके साथ मरती हैं कई और छोटी छोटी चीज़ें
मरने का इन्तजार
पूरे जीवन के वर्षों से कहीं अधिक दीर्घ होता है !
सोमवार, 10 सितंबर 2018
मौजूद रहेंगी ध्वनियाँ
एक दिन कुछ ऐसा होगा
मिट जाएगी पृथ्वी
ये महल
ये अट्टालिकाएं
ये सभ्यताएं
सब मिटटी बन जाएँगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .
जब सब सागर
सूख जायेंगे
नदियाँ मिट जायेंगी
मछलियों की हड्डियां
अवशेष बचेंगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .
मनुष्य रहे न रहे
मनुष्यता उसमे बचे न बचे
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .
मिट जाएगी पृथ्वी
ये महल
ये अट्टालिकाएं
ये सभ्यताएं
सब मिटटी बन जाएँगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .
जब सब सागर
सूख जायेंगे
नदियाँ मिट जायेंगी
मछलियों की हड्डियां
अवशेष बचेंगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .
मनुष्य रहे न रहे
मनुष्यता उसमे बचे न बचे
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .
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