पकने लगे हैं धान
बजने लगा है
हवा में संगीत
घुलने लगी है
ठंढ, धूप में .
झड़ने लगी है
रातरानी
लदने लगे हैं
अमलतास ओस से
पकते हुए धान के साथ .
खलिहान की आतुरता
देखते ही बनती है
धान के स्वागत के लिए .
पकने लगे हैं धान
बजने लगा है
हवा में संगीत
घुलने लगी है
ठंढ, धूप में .
झड़ने लगी है
रातरानी
लदने लगे हैं
अमलतास ओस से
पकते हुए धान के साथ .
खलिहान की आतुरता
देखते ही बनती है
धान के स्वागत के लिए .
बनती हैं
प्रतिमाएं मिट्टी की
बड़े जतन से कुम्हार
गढ़ता है सबसे पहले पैर
और आखिरी में आँख ।
आँखों के खुलते ही
प्रतिमा में प्रतिष्ठित हो जाते हैं प्राण !
सचमुच ,आँखों में ही बसते हैं प्राण ।
पेड़ से पत्तों को
होना ही होता है अलग
नियम है यह प्रकृति का
लेकिन पत्तों को सायास
पेड़ से अलग करना
है प्रवृत्ति मानवीय !
समय से फलों को
होता ही है पकना
नियम है यह प्रकृति का
लेकिन फलों को
सायास पकाना
है प्रवृत्ति मानवीय !
समय से उम्र को
ढलना ही होता है
नियम है यह प्रकृति का
लेकिन रोकना उम्र को ढलने से
है प्रवृत्ति मानवीय !
वर्ष २०२३ के लिए साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता जॉन फ़ॉस की कविताओं का हिंदी अनुवाद
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1 (THE MOUNTAIN HOLDS ITS BREATH)साँसें
रोक कर खड़ा पहाड़ उसने
ली गहरी साँस और
फिर वहीँ टिक गया पहाड़ और
पहाड़ वहीँ टिका रहा सदियों तक और
इस तरह पहाड़ बचाए रहा अपना अस्तित्व और
उसकी जड़ें नीचे धसती रहीं गहरी
और बहुत गहरी स्वयं
में लिपटी हुई और
थामें हुई अपनी साँसें स्वर्ग
और समुद्र जब
मचा रहे हाहाकार रोके
हुए हैं अपनी साँसें, पहाड़ . |
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2 LIKE A BOAT IN THE FINE WINDतूफ़ान
में नाव की भांति मैं
और तुम तुम
और चाँद तुम
और हवा तुम
और ये झिलमिल सितारे शायद मिटटी
में दबकर सड़
रही लाशों की तमाम
दुर्गंधों के
बीच कई
लोग, मेरी तरह या
उनकी तरह जो दफ़न
कर देते हैं अपनी हतोत्साहित
आशाएं बिना
किसी पीड़ा के. हाँ!
किसी तूफ़ान में नाव की भांति मैं
और तुम . |
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3 ONLY KNOWजो
केवल हम जानते हैं गीत, समुद्र
का गीत पहाड़
की चोटियों से निकलकर छा
जाता है आसमान के वितान पर नीले
क्षितिज पर, गुनगुनाते हुए साथ
साथ हैं हम और
जहाँ हम नहीं कहते कुछ भी एक दूसरे से और
अनकहा, जो
केवल हम जानते हैं ! |