गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

पकते हुए धान

पकने लगे हैं  धान

बजने लगा है 

हवा में संगीत 

घुलने लगी है 

ठंढ, धूप में . 


झड़ने लगी है 

रातरानी 

लदने लगे हैं 

अमलतास ओस से

पकते हुए धान के साथ  . 


खलिहान की आतुरता 

देखते ही बनती है 

धान के स्वागत के लिए  .  




7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना सर।
    धान की बालियाँ
    सुखों की जालियाँ
    -----
    सादर।
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २० अक्टूबर२०२३ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. इन पंक्तियों में गाँव और फसल का बहुत सादा और प्यारा चित्र उभरता है। पकते धान, ठंडी हवा और हल्की धूप का एहसास मन को अच्छा लगता है। रातरानी की खुशबू, ओस में लदे अमलतास और खलिहान की हलचल सब कुछ आँखों के सामने आ जाता है।

    जवाब देंहटाएं