गुरुवार, 1 जनवरी 2026

गज़ल : छुपी है धूप

छुपी है धूप है भर गया कोहरा

बिना ज़ुर्म के मैं बन गया मोहरा 


जिम्मेदरियों ने मुझे झुकाया इतना 

पीठ मेरा देखो, ऐसे हो गया दोहरा 


नाराज हो जब, नदी बहाती भी है 

जब भी धार पर लगाया गया पहरा 


पहचानना कठिन है इन दिनों 

किसने चेहरे पे है लगाया चेहरा 


धर्म जाति का शोर हुआ इतना 

न्याय औ' संविधान बन गया बहरा 


4 टिप्‍पणियां:

  1. यह ग़ज़ल सीधे मन में चोट करती है। आप धूप और कोहरे के टकराव से ही पूरी बेचैनी दिखा देते हैं। “बिना जुर्म मोहरा बनना” आज के आम आदमी की सच्चाई लगती है। जिम्मेदारियों से झुकी पीठ हर पाठक को अपनी लगती है। नदी और पहरे वाली लाइन मुझे बहुत असरदार लगी, क्योंकि आप गुस्से को भी बहाव देते हैं।

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  2. गज़ब...मारक गज़ल सर।
    धारदार लिखे हैं।
    सादर।
    -------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शनिवार ३ दिसम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    नववर्ष मंगलमय हो।

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    1. क्षमा चाहेंगे,कृपया ३ दिसम्बर को ३ जनवरी पढ़े।
      सादर।

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