बुधवार, 14 अगस्त 2013

तिरंगे का रंग




मेरे गाँव के बच्चे 
जो कभी कभी ही 
जाते हैं स्कूल 
आज 
घूम रहे हैं लेकर तिरंगा 
लगा रहे हैं नारे 
भारत माता की जय 

भारत माता 
उनकी अपनी माता सी ही है 
जो नहीं पिला पाती है 
अपनी छाती का दूध 
क्योंकि वह बनता ही नहीं 
मुझे वे कोरबा के आदिवासियों से लगते हैं तब 
जिनकी जमीन पर बनता है 
विश्व का अत्याधुनिक विद्युत् उत्पादन संयत्र 
करके उन्हें बेदखल 
अपनी ही मिटटी से , माँ से 

मेरे गाँव के बच्चे का तिरंगा 
बना है रद्दी अखबार पर 
जिसपर छपा है 
देश के बड़े सुपरस्टार का विज्ञापन 
जो अपील कर रहा है 
कुपोषण को भागने के लिए 
विटामिन, प्रोटीन युक्त खाना खिलाने के लिए 
सोचता हूँ कई बार कि 
क्या सुपरस्टार को मालूम है 
कैसे पकाई जाती है खाली हांडी और भरा जाता है पेट 
जीने के लिए, पोषण के लिए नहीं 
और कुपोषितों तक नहीं है पहुच 
अखबारों की 

हाँ ! मेरे गाँव के बच्चों का तिरंगा 
बना है रद्दी अखबार से 
ऊपर केसरिया की जगह 
लाल रंग है 
जो उसने चुरा लिया है 
माँ के आलता से 
उसे मालूम नहीं कि 
केसरिया और लाल रंग में 
क्या है फर्क 
फिर भी रंग दिया है 
अखबार को आधे लाल रंग से 
और स्याही से रंग दिया है 
आधे अखबार को 
हरियाली की जगह 

मेरे गाँव के बच्चे को 
नहीं मालूम कि 
हरियाली कम हो रही है देश में , गाँव में 
और कार्पोरेटों का सबसे प्रिय रंग है नीला 
नीला क्योंकि आसमान है नीला 
नीला क्योंकि समंदर है नीला 
कार्पोरेट को चाहिए 
आसमान और समंदर सा नीला विस्तार 
किसी भी कीमत पर 
ऐसा कहा जाता है 
उनके कार्पोरेट आइडेनटिटी मैनुअल और विज़न स्टेटमेंट में 

और हाँ 
बीच में श्वेत रंग की जगह 
अखबार के छोटे छोटे अक्षर झांक रहे हैं 
अब बच्चे को क्या मालूम कि 
अखबार के छपे के कई निहितार्थ होते हैं 
और श्वेत शांति का नहीं रहा प्रतीक 

मेरे गाँव के बच्चे 
आज फहरा रहे हैं तिरंगा 
जिसमे  नहीं है 
केसरिया, हरियाली या सफेदी ही 


(स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !)

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र



मेजें थपथपा कर 
हो रहे हैं 
निर्णय 
आप चुप रहिये 
काम पर है 
दुनिया का  सबसे बड़ा लोकतंत्र 

विरोधी दल 
उखाड़ कर माइके 
कर रहे हैं विरोध 
आप चुप रहिये 
काम पर है 
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र 

वातानुकूलित कक्ष में बैठ 
तय की जा रही हैं रेखाएं 
भूख की सीमायें 
आप चुप रहिये 
काम पर है 
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र 

पिछले वर्ष के आकड़ो में 
करके कुछ फेर बदल 
हो रहा है सर्वेक्षण 
आप चुप रहिये 
काम पर है 
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र 

जनतांत्रिक हो गया है 
सब्सिडी की हिस्सा 
आप चुप रहिये 
काम पर है 
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र 

आपको दी जा रही है 
भूख से सुरक्षा की गारंटी 
शिक्षा की गारंटी 
काम की गारंटी 
सूचना की गारंटी 
आप चुप रहिये 
काम पर है 
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र 

रविवार, 4 अगस्त 2013

रेखाएं

(देश भर में मानसून अच्छा है , कह रहा है मौसम विभाग। नदियाँ उफान पर हैं।  मीडिया क्रिकेट , टमाटर और प्याज़ में व्यस्त है।  लेकिन आधे देश में बारिश अच्छी नहीं हुई है।  किसान के धान बारिश के पानी का बाट जोह रहे हैं।  धान की कोख में इन्ही बूंदों से मोती जमेंगे।  और किसान की इस चिंता को साझा करती कविता।  ) 


रेखाएं
न उभरे
तो ही अच्छा है
न चेहरे पर
न खेतो में 


बाबूजी के चेहरे पर
उभर आती हैं
तरह तरह की रेखाएं
आड़ी तिरछी
जब पानी बिना खेतो में
उभर आती हैं रेखाएं
दरारों के रूप में


आसमान का रंग
नीला नहीं काला होना चाहिए
सावन भादो में
पगडंडियों पर धूल नहीं
कीचड होना चाहिए
कहते हुए खेत की मेढ़ पर बैठा किसान
खींच देता है एक रेखा
अपने बूढ़े नाखून से 
धान की कोख से रिसने लगता है 
सफ़ेद खून
अच्छा नहीं है 
किसी किसान का 
रेखा खींच, फसल की कोख को 
लहूलुहान कर देना 

रेखाएं उभर आई हैं 
भालों और बरछों की तरह 
नीले आसमान में, सूखे खेतो में 




शुक्रवार, 3 मई 2013

 चीन लद्दाख में डेरा जमाये बैठा है. जब रक्षामंत्री प्रधान मंत्री के पास गए होंगे कि सेना को आदेश दीजिये कि चीन के साथ सख्ती दिखाएँ तो उन्होंने वित्त मंत्री से पूछा होगा. वित्त मंत्री जी के पास देश भर से व्यापारियों के फोन आये होंगे कि माई बाप, चीन के माल के बिना न तो प्लांट चलेंगे न खुदरा बाज़ार, न कपडा बाज़ार की रौनक रहेगी न इलेक्ट्रोनिक बाज़ार की . देश के अर्थव्यवस्था के लगभग दस प्रतिशत हिस्से पर चीन का परोक्ष कब्ज़ा है. हम चीन से लगभग 44 मिलियन यु एस डालर का माल आयात करते हैं और निर्यात केवल 15 मिलियन यु एस डालर। जिस देश में तमाम मन्युफेक्चारिंग गतिविधिया बंद हो गई हो चीन से इम्पोर्ट के भरोसे, वह देश कभी अपनी संप्रभुता की रक्षा नहीं कर सकता . हम बहुत कमजोर हैं और लगातार कमजोर हो रहे हैं चीन के मुकबले. चीन से इम्पोर्ट के कारण देश में बेरोज़गारी बढ़ी है क्योंकि लाखों निर्माण गतिविधियाँ बंद हुई हैं , रेडीमेड वस्त्र, छोटे कल पुर्जे, खिलौंगे, कपडे, प्लास्टिक के उत्पाद, बाल बियरिंग आदि आदि में चीन का कब्ज़ा है हमारे बाजारों पर. आर्थिक राष्ट्रवाद जरुरी है प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री जी ! प्रस्तुत है मेरी एक कविता :

 

रुपया


१. 
रुपया 
गिर रहा है
लगातार
होकर कमजोर 
वह रुपया जो
आम जनता की जेब में
नहीं है, फिर भी
रोटी आधी हो रही है
नमक कम हो रहा है
उसकी थाली से,
फिसल रहा है 
उसकी जेब से 
२.
रूपये  से
खरीदना  है
पेट्रोल, गाड़ियाँ
कपडे, घड़ियाँ
टीवी, इंटरनेट,
हवाई जहाज़ और उसकी टिकटें
ई एम आई और क़र्ज़ 
आत्मनिर्भरता नहीं
खरीद सकता 
अपना रुपया 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

आज मजदूर दिवस है

आज मजदूर दिवस है. आज के ही दिन वर्ष 1991 में मेरी पहली कविता "मजदूर" धनबाद, झारखण्ड से प्रकाशित दैनिक जनमत में छपी थी . उसके बाद धनबाद में मजदूरों के बीच थोडा बहुत  काम किया . एशिया के प्रसिद्द मजदूर  कालोनी भूली में दोस्तों के साथ मिलकर निःशुल्क ट्यूशन पढाया, पुस्तकालय खोला, पानी बिजली की लड़ाई लड़ी और फिर एक दिन अचानक सब छोड़ मैनेजमेंट की पढाई करने धनबाद से जो बाहर निकला सो फिर लौटा नहीं . एक बोझ मन में अब भी है. शायद ही कभी उतरे। पिछले साल मई में ही नेशनल बूक ट्रस्ट द्वारा आयोजित शिमला पुस्तक मेला में अपने प्रकाशन के साथ पहली बार शिमला गया और वहां माल रोड पर कुलियों को देख शिमला का आनंद जाता रहा और एक कविता बनी। साहित्यिक पत्रिका हंस के मई अंक में ही यह कविता प्रकाशित हुई है . शिमला के साथ साथ पहाड़ो के तमाम कुलियों को मजदूर दिवस पर समर्पित कविता आपसे साझा करता हूँ 


माल रोड, शिमला



गोरखा युद्ध से लौटे
अपने सेनापति के लिए
ब्रिटिश साम्राज्य का
उपहार था शिमला
जिसे कालांतर में बनाई  गई
गुलाम भारत की  ग्रीष्मकालीन राजधानी

कहा जाता है
कालों को अनुमति नहीं थी
माल रोड तक पहुचने की
और गुलामी का प्रतीक
माल रोड शिमला में
अब भी पाए जाते हैं कुली
जो अपनी झुकी हुई पीठ पर
लादते हैं अपने से दूना वज़न तक
जीवन रेखा हैं ये
इस शहर की

पीठ पर
लाते हैं उठा
माल रोड की चमक दमक
रौनक
और किनारे पडी
किसी लकड़ी की बेंच के नीचे बैठ
सुस्ताते पाए जाते हैं
आँखों में सन्नाटा लिए


आँखे नहीं मिलाते हैं
ये कुली
क्योंकि झुकी हुई पीठ से
आदत हैजमीन को देखने की
ख़ुशी से भरे चेहरों के बीच
अकेले होते हैं
ये कुली

जब भी आता है 
जिक्र
माल रोड या  शिमला का
नहीं होता है जिक्र  पीठ पर वजन उठाये
इन कुलियों का
इस चमक के पीछे
घुप्प अँधेरा होता है
इनकी जिंदगी में

दासता के पदचिन्ह
और गहरे होते जाते हैं
जब भी उठाते हैं
अपनी पीठ पर वजन
और मापते हैं पहाड़ की ऊंचाई,
ये कुली.