सोमवार, 19 जून 2017

मिट्टी



नमी रखकर 
अपने भीतर 
बीज को देती है गर्मी 
बीज पनपता है 
देता है फल फूल 
और गिरकर 
मिट्टी बन जाता है 

मिट्टी 
न तो बीज के वृक्ष बनने पर 
इतराती है 
न उसके मिट्टी में मिलने पर 
करती है विलाप /रोदन 

मिट्टी गर्म होती है धूप से 
वह गीली होती है पानी से 
वह पक कर आग में ईंट हो जाती है 
कुम्हार के चाक पर ढल जाती है 

फिर से मिट्टी होने पर  उसे कोई गुरेज़ नहीं 
यही है मिट्टी की सबसे बड़ी पहचान।  


शुक्रवार, 16 जून 2017

समझ

समझना 
एक कला है 
किन्तु 
आज इसे 
विज्ञान के सिद्धांतों की तरह 
कसौटी पर जाता है 
कसा।  

मंगलवार, 13 जून 2017

किसान की व्यथा




खाली मेरी थाली 
भरा है तेरा पेट 
अन्न उगाऊं मैं 
खाऊन मैं सल्फेट 


मिटटी पानी से लड़ूँ 
 उसमे रोपूँ बीज 
पसीना मेरा गंधाये
महके तेरी कमीज़ 


खूब जो उगे मेरी फसल 
गिर जाए इसका मोल 
कोल्डस्टोरेज में भरकर 
पाओ तुम दाम अनमोल 


जो व्यापारी बन गए 
उनके खुले हैं भाग्य 
जो बैठे धरती पकड़ 
रोये अपने दुर्भाग्य 


गेहूं  न फैक्ट्री उपजे 
कंप्यूटर न बनाए धान 
जिसदिन देश ये समझे 
बढे किसान का मान 

सोमवार, 12 जून 2017

विश्राम




समय 
तुम कब रुके थे आखिरी बार 
याद है क्या तुम्हे 
विश्राम का कोई एक पल 

समय क्या तुम रुके थे 
जब सीता के लिए फटी थी पृथ्वी 
या फिर राम ने ली थी जल समाधि 
द्रौपदी के चीरहरण पर 
अभिमन्यु की मृत्यु पर ही।  

समाधिस्थ हो रहे बुद्ध को देख भी 
समय तुम नहीं ठहरे 
न ही ठहरे तुम नालंदा को जलते देख 
कलिंग के भीषण नरसंहार को देख भी 
तुम्हे वितृष्णा नहीं हुई 
 रुके नहीं तुम, समय 

हिरोशिमा और नागाशाकी में 
आधुनिक विज्ञानं के चमत्कारिक नरसंहार के 
बने तुम साक्षी 
समय, तुम क्यों नहीं करते विश्राम !

तुम रुक गए तो क्या होगा अधिक से अधिक 
गहन अन्धकार की सुबह नहीं होगी 
किन्तु क्या तुमने सोचा है कितना अन्धकार है 
इस रौशनी के पीछे ! 

समय, तुम्हे विश्राम की आवश्यकता है, जाओ, ठहर जाओ।  

बुधवार, 7 जून 2017

बर्फ




बर्फ बोलते नहीं 
पत्थरों की तरह 
वे पिघलते भी नहीं 
इतनी आसानी से 
वे फिर से जम जाते हैं 
जिद्द की तरह।  



बर्फ का रंग 
हमेशा सफ़ेद नहीं होता 
जैसा कि दिखता है नंगी आँखों से 
वह रोटी की तरह मटमैला होता है 
बीच बीच में जला हुआ सा 
गुलमर्ग के खच्चर वाले के लिए 
तो सोनमार्ग के पहड़ी घोड़े के लिए 
यह हरा होता है घास की तरह 


बर्फ हटाने के काम पर लगे 
बिहारी मजदूर देखता है 
अपनी माँ का चेहरा 
जमे हुए हाथों से 
बर्फ की चट्टानों को हटाते हुए 

बर्फ 
प्रदर्शनी पर लगे हैं 
इनदिनों 
जिसका सीना छलनी है 
गोलियों के बौछार से 
तो इसका मस्तक लहूलुहान है 
पत्थरबाज़ी से।