शुक्रवार, 28 मई 2010

लाल मिट्टी का लाल सलाम


कभी
नंगे पैरों में
लगा कर देखो
लाल मिट्टी
जान पाओगे
तुम
बूट भरे पैरों के नीचे
रौंदी जा रही
इस मिट्टी का
लाल रुदन


कभी
नंगे पाँव
पार करके देखो
हमारी कटोरी नदी
इसके कल कल स्वर में
सुनायी देगी
तुम्हे
मिट्टी की
लाल सिसकियाँ


कभी
बिना हथियार के
बात करके देखो
हरे पत्तों से
और
पत्तों के पीछे छुपे
कोयलों से
सुन पाओगे
तुम
इस मिट्टी का
सबके लिए
लाल सलाम

रविवार, 23 मई 2010

बाज़ार

मैं बाज़ार हूँ
तैयार हूँ
बेचने के लिए
कुछ भी
किसी को भी

मेरे लिए
सब कुछ है
सामान
और
लग सकती है
किसी की भी
कीमत

सपने
मेरे लिए हैं
सबसे बड़े
हथियार
उनके दम पर
बेच लेता हूँ
मैं
सब कुछ

जरूरतों से
आजकल
तय नहीं होता
मैं
बल्कि
मैं
तय करता हूँ
जरूरते

इन दिनों
जब शोर मचा हुआ है
चारो ओर
कि
भावना शून्य
हो गया है सब कुछ
मैं
बहा ले जाता हूँ
लोगों को
भावना के
ज्वार में

हंसने से लेकर
रोने तक
सभी भाव का है
अपना मूल्य

अब
मुझ तक
पहुँचने की जरुरत नहीं
पहुँच रहा हूँ
मैं
खुद
दरवाजे दरवाजे
और कहू तो
किचेन से शयन कक्ष तक
पहुँच हो गई है
मेरी

मैं ही
तय करता हूँ
किचेन में
कब क्या पकेगा
सुबह
दोपहर
शाम
और रात का मेनू
तय करता हूँ
मैं

कौन सा रंग
शुभ है आपके लिए
कौन सी दिशा में
जाना रहेगा ठीक
किस ग्रह का
कितना प्रभाव है
यहाँ तक कि
कौन से इश्वर
करेंगे आपका कल्याण
यह भी
मैं बताता हूँ


और तो और
मैं
बताता हूँ
सेहत के लिए
क्या और कितना खाना
रहेगा ठीक
यानी
भूख की सीमा भी
तय करता हूँ मैं


जिन पर
लोगो का है
जितना अधिक एतबार
वे ही
पहले बिके हैं
मेरे यहाँ
और
उतनी ही
अधिक कीमत पर

बाज़ार हूँ
मैं





पम्फलेट

मुस्कुराते हैं
अखबारों के पन्नों के बीच
फंसे, गुंथे , लिपटे
पम्फलेट
ख़बरों पर
और उनकी घटती
विश्वसनीयता पर


ख़बरों के कानो में
जाके जोर से चिल्लाते हैं
पूरी रंगीनियत के साथ
कि
ख़बरों से पहले
पढ़े जाने लगे हैं वो...
पम्फलेट

ख़बरों और
अखबारों के लिए
ए़क बड़ी खबर हैं
ये महत्वहीन
पम्फलेट

गुरुवार, 20 मई 2010

बस्तर मेरा नहीं

१.
पत्तों का
पत्तों से संवाद
थम गया है
जंगल में
जब से
बूटों का पहरा
पड़ गया है

२.
पत्तों ने
खो दिए हैं
अपने रंग
जब से
फ़ैली है
जंगल में
बारूदी गंध

३.
शाखों पर
ठिठकी कोयल
हो गई है
मौन
जब से
जंगल को
वे रहे हैं
रौंध

४.
कोख में
जो पडा है
सोना
साजिश कर
शांति है
उसी ने छीना

५.
मेरी धरती
मेरा जंगल
फिर भी
नहीं है
मेरा बिस्तर
मेरा 'बस्तर'

मंगलवार, 18 मई 2010

नए रंग का बनना

नया रंग
बनता है
जब
ए़क रंग
खो दे
अपनी पहचान
किसी और रंग में

सोमवार, 17 मई 2010

तुमसे

१.
हर रंग
तुम में जाकर
जाते हैं
मिल
और
बन जाते हैं
स्वप्निल इन्द्रधनुष


हर राह
तुम तक
रही हैं
पहुँच
और
बन जाती है
मंजिल

३.
हर भाव
तुम्हारे लिए
हो रहे हैं
अंकुरित
और
बन रहे है
अभिव्यक्ति की
पौध


हर शब्द में
हो रही हो
तुम
विम्बित
और
रचा जा रहा है
काव्य


हर कल्पना
तुम से है
और
निर्मित हो रहा है
ए़क नया
संकल्प


हर स्वर
तुमसे है
झंकृत
और
गुंजित है
व्योम में
अभिनव संगीत

शुक्रवार, 14 मई 2010

पीढ़ियों से सड़े हुए दांत

हुजूर
पीढ़ियों से
सड़े हुए हैं
हमारे दांत

हमारे बाबा के
बाबा थे
'बलेल'
बुरबक कहे जाते थे
वे
सो
वे बलेल थे

ए़क सांस में
घंटो तक शहनाई
बजा लेते थे
लेकिन
कहते हैं
उनके भी दांत
सड़े हुए थे

सडा हुआ दांत
हुजूर
ख़राब कर देता
चेहरा
और
ठंढा गरम
की कौन पूछे
रोटी भात तक
खा नहीं सकते

पीढ़ियों तक
होता रहा
ऐसा ही
हमारे साथ

मेरे बाबा
थे मिश्री
नाम तो
मिश्री था
लेकिन
हुजूर
नसीब नहीं हुई थी
उन्हें
चीनी तक
और
बिना मीठा खाए
सड गए थे
उनके दांत

कहते हैं
वो समय ही ऐसा था
जो
हमारी पीढ़ी में
किसी को
नहीं आयी थी
अकल दाढ़

आप ही
बताइए
हुजूर
बिना अक्ल दाढ़ के
कैसे आएगी
अक्ल
सो नहीं आयी
हमारी किसी पीढ़ी को
अकल
और
ना ही बंद हुआ
हमारी दांतों का
सड़ना

हवेली वाले
कहते थे
हमारे देह से
आती है
बदबू
लेकिन
हुजूर देखते रहे
पीढ़ियों तक
हम
अपने पसीनों से
जगमगाती
हवेलिया
खेत खलिहान
और
फिर भी
सड़े हुए थे
हमारे दांत

दांत को
बस दांत मत
समझिएगा हुजूर
क्योंकि
सड़े हुए
दांत के बहाने
विकृत किया जा चुका था
हमारी सोच
हमारी अस्मिता
हमारा स्व

हुजूर
आप ही बताओ
कब तक
रहेंगे हम
सड़े हुए
दांतों के साथ

अब
जब हम
काट रहे हैं
आपको दांत
हुजूर
तो क्यों
शोर मचा हुआ है
चारो ओर

बुधवार, 12 मई 2010

ताज से लौट कर- २

लौट कर
ताज से
टूट गया
भ्रम
कि
निश्चल
प्रेम का
है प्रतीक
ताज

नहीं है
ऐसा
क्योंकि
शाहजहाँ ने
नहीं बनवाया
ताज
अपनी
पहली पत्नी के लिए
जो
जन ना सकी
कोई वारिस
उसके लिए


हाँ
ताज के साथ ही
सटे
पहली बेगम का
कब्र
जरुर लगता है
अपना सा
आम सा
उपेक्षित


मंगलवार, 11 मई 2010

ताज से लौट कर

लौट कर
ताज से
टूट गया है
भ्रम
कि
प्रेम का
ए़क मात्र
प्रतीक है
ताज

ताज
सुंदर नहीं
उस चेहरे से
जिसे देख कर
शुरू होने वाला
हर दिन
जिंदगी से लड़ने का
देता है हौसला

ताज
नरम नहीं
उन नन्ही हथेलियों से
जिसके स्पर्श मात्र से
मिट जाती है
माथे की सिलवटें
हर दिन

ताज के
प्रांगन में
अमरुद का
वह पेड़ नहीं
जिस पर
दिन भर
फुदकती है गौरैया
और करती है
अटखेली
गिलहरी
अपने पूरे परिवार के साथ

हाँ
ताज के
पीछे बहने वाली यमुना
जरुर
लगती है अपनी सी
संघर्षरत
बचाती अपना
अस्तित्व

शनिवार, 8 मई 2010

सच का सच

सच
वो नहीं
जो
अखबारों के पन्ने पर
छपा होता है
या
टी वी चैनलों पर
मचा मचा कर शोर
दिखाया और
सुनाया जाता है

सच
पत्रकार के
कलमों की स्याही में
सूख रहा होता है
या फिर
उसके
वर्किंग टेबल के
नीचे पड़े डस्ट-बिन में
डर कर दुबका होता है
और अगले दिन
पेपर षड्दर में
बदल जाता है
चिंदियों में

सच
टी वी चैनलों के लिए
मुफ्त में काम कर रहे
स्ट्रिंगरों के कैमरों में
होता है
जिसे ना दिखाने के लिए
वसूली जाती है
रकम और
इस खबर से बेखबर
स्ट्रिंगर और
उसके कैमरे में दबा
सच
तोड़ रहा होता है
अपना दम

सच
होता है
ताकतवर
वसूल लेता है
अपनी भरपूर कीमत
और
हो जाता है
दफ़न
झूठ के साए में

यही
सच है
सच का

शुक्रवार, 7 मई 2010

मेरी पहचान से असहज तुम

बहुत
प्रेम करते थे
तुम मुझे

किस दिन
क्या पहन रही हूँ
पता लग जाता था
तुझे

मेरे बिना
चेहरा धूमिल
हो जाया करता था
तुम्हारा

मेरे
ना होने के
एहसास भर से
भरी आँखों से
अपना चेहरा
छुपा लेते थे
मेरी आँचल में

कौन से रंग की शर्ट
फबेगी तुम पर
यह भी
पूछते थे
मुझ से ही

मेरे प्यार में पड़कर
सीखा तुमने
खाना
पानी पूरी
संभार बड़ा
और भी कई
लड़कियों वाले खाने

अपनी बाईक
पार्किंग में लगा
मेरे साथ
घूमते थे तुम
बस में

फिर
बहुत सोच समझ कर
तुमने दिया
शादी का प्रस्ताव

मैंने कहा
'सोच लो
ए़क बार फिर '

तुमने
'हां' कहा था

मैंने कहा
नहीं चाहिए
मुझे कुछ
बस चाहिए
मेरा अपना
नाम

नाम
जो माँ ने दिया
मुझे
है मेरी अपनी
पहचान

बस
नहीं लगा पाऊँगी
तुम्हारा 'उपनाम'

और
व्यथित हो गए
तुम
और
क्षत विक्षत हो गया
तुम्हारा अहम्

तुम्हारे भीतर के
कुंठित 'पुरुष' ने
कर दिया मुझे
अस्वीकार


तुम्ही कहो
कैसे जिया जा सकता है
सम्पूर्ण जीवन
उसके साथ
जो मेरी अपनी पहचान से ही
जो हो जाए
असहज

मेरी
पहचान से
असहज
तुम्हारे ना हो सकने का
अफ़सोस भी नहीं
मुझे

बुधवार, 5 मई 2010

चाय

१.
चाय
अदरक वाली हो
या सौफ वाली
डाली हो उसमे
तुलसी की पत्तियां
खुशबू तो उसमे
होती है
तुम्हारे हाथों की


२.
चाय
सुबह की हो
ढलते शाम की
या फिर हो
देर रात की
समाया होता है
उसमे
तेरा अपनापन

३.
चाय
किचेन में हो
बालकोनी में हो
या हो बेडरूम में
मीठी तो होती है
वह
तुम्हारे एहसास से

मंगलवार, 4 मई 2010

किताब


क्या
तुमने भी
महसूस किया है
इन दिनों
खूबसूरत होने लगे हैं
किताबो के जिल्द
और
पन्ने पड़े हैं
खाली


क्या
तुम्हे भी
दीखता है
इन दिनों
किताबों पर पड़ी
धुल का रंग
हो गया है
कुछ ज्यादा ही
काला
और
कहते हैं सब
आसमान है साफ़


क्या
तुम्हे भी
किताबो के पन्ने की महक
लग रही है कुछ
बारूदी सी
और उठाये नहीं
हमने हथियार
बहुत दिनों से


क्या
तुमने पाया है कि
किताब के बीच
रखा है
ए़क सूखा गुलाब
जबकि
ताज़ी है
उसकी महक
अब भी
हम दोनों के भीतर

रविवार, 2 मई 2010

प्रश्न काल

भाई साहब
ए़क स्कूल चला था
मेरे गाँव के लिए
दिल्ली से
कोई साठ साल पहले
और
पीढियां गुजर गईं
स्कूल के इन्तजार में
रौशनी से महरूम

खबर
नहीं बन सका
स्कूल का गुम जाना
कभी किसी
अखबार में
कोई रपट नहीं आयी
कभी धरने नहीं हुए
किसी प्रेस वार्ता में
कोई असहज नहीं हुआ
क्योकि
यह प्रश्न पूछा ही नहीं गया

यही नहीं
भाई साहब
ए़क अस्पताल भी
चला था
मेरी गाँव की ओर
और
सुना है
अभी भी
वो रास्ते में है
लेकिन
इन साठ सालों में
मेरी हजारों बहने
जचगी के दौरान
पहुँच गई ऊपर
लेकिन
नहीं पहुँच सका
अस्पताल मेरे गाँव

ना तो
अस्पताल का नहीं पहुंचना
खबर बन सका
ना ही
मेरी बहनों की मौत

कभी किसी
पत्रकार ने
नहीं उछाला जूता
किसी
मंत्री
सांसद
विधायक
कलेक्टर के आगे
ना ही
इस पर हुआ कभी
संसद में वाक्आउट

ना ही
कभी
पूछा गया
संसद में कोई प्रश्न
प्रश्न काल में ।

है ना
प्रश्न काल यह
मेरे गाँव के लिए !