बुधवार, 24 नवंबर 2021

एक दिन

 एक दिन 

बूढ़ी हो जाएगी माँ

सूख जाएगा इस बगीचे का 

सबसे पुराना वृक्ष 

उठेगा मेरे घुटने में दर्द 

बंद हो जाएंगा पत्नी का ऋतुचक्र 

पुरानी किताबें दे दी जाएंगी 

रद्दी वाले को 

परचून की दुकान बंद हो जाएगी 

गाँव के मुहाने पर खड़ा रिक्शावाला नहीं मिलेगा 

और कभी गुलज़ार रहने वाला घर /जो अब बादल गया है 

खंडहर में /जिसके आँगन में अब उग आए हैं 

बरगद और पीपल 

वे बरगद और पीपल और अधिक बड़े हो जाएंगे 

बचपन में लगी थी जो फैक्ट्रियाँ 

उनका धुआँ और अधिक काला पड़ जाएगा 

जिन तालाबों का पानी पीते थे बेधड़क 

वे तालाब  सूख जाएंगे 

और उदास हो जाएंगे नदियों के तट 

जिनपर पर "मास" करने नहीं आया करेंगे आस्थावान श्रद्धालु । 


ऐसा नहीं है कि

यह सब पहली बार होगा 

न ही होगा यह आखिरी बार । 



5 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(२५-११-२०२१) को
    'ज़िंदगी का सफ़र'(चर्चा अंक-४२५९ )
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 25 नवंबर 2021 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  3. समय के साथ नकारात्मकता के दृश्य उकेरता सार्थक हृदय स्पर्शी सृजन।

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  4. सही कहा हमेशा से होता आ रहा है और होता ही रहेगा हम कभी नहीं चेतेंगे।
    बहुत ही सुन्दर सृजन।

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