मंगलवार, 19 जनवरी 2010

कुछ छोटी कवितायें


खो कर
पाने कि तमन्ना लिए
खुश हैं हम
रेत भर कर मुट्ठी में
सपने संजो रहे !

रेत घडी
जिसने भी बनाई हो
वैज्ञानिक से ज्यादा
आशिक रहा होगा !


मोती नहीं चाहिए
हमे
ओस की वो बूंदे ही दे दो
हर सुबह
जिंदगी के लिए !


दिल करता है
तुम्हारे किचन के डिब्बओं पर लिख दूं
'चीनी... तुमसे मीठी नहीं लेकिन '
'चाय... तुमसे ताजी नहीं लेकिन'
'हल्दी... तुमसे पीली नहीं लेकिन'
'मिर्च... तुमसे तीखी नहीं लेकिन'
और भी बहुत कुछ
कि तुम बस मुस्कुरा कर रह जाओ...
उस मुस्कराहट से ज्यादा
कुछ हो सकता है क्या॥

सोमवार, 18 जनवरी 2010

फूल खिलेंगे

पत्ते

साख से

तब तक नहीं गिरते

जब तक जड़ों में

होता है जीवन

अपनेपन की

जड़ों से जुड़ कर

कैसे सूख सकता है

प्यार किसी का

रिश्ता देते हैं

हवा, पानी और खाद

कि फूल खिले

हर पौध में

पौधों का

जड़ों से रिश्ता

समझना है नए सिरे से !

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

रिश्तों को भार ना बनाएं



रिश्तों को भार ना बनाएं


कहें, सुने, बातें मनवायें, मना ना करें


रिश्तों को भार ना बनाएं


उम्र छोटी है, बातों को लम्बी ना बनाएं


रिश्तों को भार ना बनाएं


ख़ामोशी की दुरी होती है लम्बी


समझें, समझायें, चुप्पी तोड़ें


रिश्तों को भार ना बनाएं


ये सड़क लम्बी है दूर तक जायेगी


क्षितिज को मिलाने का खाब हम क्यों पालें


रिश्तों को भार ना बनाएं

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

तुम्हारे क़दमों के निशा

अब तक हैं
तुम्हारे क़दमों के निशा यहाँ
अब तक है
तुम्हारी खुशबू
इन् वादियों में

इक बीज जो बोकर गई थी तुम
इस बगीचे में
आज पेड़ बनकर
छाया देता है
मेरे दिल को

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

किताबों की तरह

किताबों कीतरह
पढना चाहता हूँ तुम्हें
पन्ना पन्ना !
समझना चाहता हूँ तुम्हें
इस तरह कि
किसी और ने ना समझा हो तुम्हें ।
तुम्हें पढ़ कर कुछ रेखांकित करना चाहता हूँ
जैसे तुम्हारी उन्मुक्त हंसी...
तुम्हारे सपने
तुम्हारे पंख
क्षितिज पर जो टिकी हैं तुम्हारी नज़रें ।
तुम्हारी उन्मुक्त हंसी में
जी भरकर जी लेना चाहता हूँ
अपनी सारी जिंदगी ।

किताबों ने लाया है
क्रांति कैसे बार ।
तल्बारों से भी भारी पड़े हैं किताब कई बार
और जन्म दिया है कई वादों को समय समय पर
पर इस बार नहीं चाहता कि बने कोई वाद।

किताब इक किताब रहे
और रहे बस मेरे लिए !