रविवार, 18 अप्रैल 2010

पश्चाताप

आदम
और इव ने
की थी
नए सृजन के लिए
ए़क गलती

सदिया
गुजर गई
और
आदम
आज भी
जल रहा है
पश्चाताप की अग्नि में
अकेला
अपनी पहली
और
पहली गलती की
आवृती पर ।

हे आदम !
आज
तुम अकेले नहीं
मैं
खड़ा हूँ
तुम्हारे साथ
पश्चाताप की
अग्नि में
जलते हुए
और महसूस कर रहा हूँ
तुम्हारी
सहश्र सदियों की
पीड़ा

लेकिन
क्या
अगली बार
नए सृजन से
पीछे हट पाओगे
आदम...

क्योंकि
सृजन
तुम्हारा उत्तरदायित्व है
और पश्चाताप
तुम्हारी नियति !

10 टिप्‍पणियां:

  1. आदम तो माध्यम है.....इव के प्रति आकर्षण उसका पश्चाताप? उसकी सहज मनोवृति - उसका पश्चाताप?
    आदम के साथ इव को शुरू में जोड़ा तो है...फिर उसे अलग कर दिया . दोनों को जोड़ देने से भाव सही होंगे....पश्चाताप यदि होना है तो दोनों को होगा

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  2. क्योंकि
    सृजन
    तुम्हारा उत्तरदायित्व है
    और पश्चाताप
    तुम्हारी नियति !
    पर यह पश्चाताप ही क्यों?
    सृजन है तो विसंगतियाँ भी होगी.
    सुन्दर रचना

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  3. लेकिन
    क्या
    अगली बार
    नए सृजन से
    पीछे हट पाओगे
    आदम...
    वाह !!!!!!!!!क्या बात है अच्छी है ये अभिव्यक्ति

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  4. बहुत ही सुन्दर और दिलचस्प रचना! बधाई!

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  5. क्योंकि
    सृजन
    तुम्हारा उत्तरदायित्व है
    और पश्चाताप
    तुम्हारी नियति !

    मज़ा आया गया पड़ कर...

    उत्तर देंहटाएं
  6. क्योंकि
    सृजन
    तुम्हारा उत्तरदायित्व है
    और पश्चाताप
    तुम्हारी नियति !aaj achank ek kavita ke peechhe chalte chalte aapke blog tak aana hua. sbhi rachnaye bhut achhi hai. shubhkamnaye.

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  7. सृजन
    तुम्हारा उत्तरदायित्व है
    और पश्चाताप
    तुम्हारी नियति ha aisa hi hai par jo uttardayitva nibhata hai vahi to galtiya karta hai,par use to nibhate jana hai,fir chahe usake pashchatap me koi sath de ya na de.

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