शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

शहर का इतिहास

जब भी
लिखा जाएगा
शहर का इतिहास
रखे जायेंगे
हाशिये के पार
कुछ लोग।

खातों में होंगे
दर्ज
कुछ खर्च
नहीं दर्ज होगा
असमय गिरे गर्भ
ईटो के बोझ तले
और
कोई हिसाब नहीं होगा
चट्टानों के बोझ के नीचे
उपजे बावासीरों का

प्राचीरों की नीव में
द्फ्ने
सपनो
हंसी
पसीनो का
कोई हिसाब
नहीं होगा
हां
हिसाब होगा
सीमेंट की बोरियों का।

और
किये जायेंगे
बही खाते
नहीं सुनी जायेगी
चौकीदार की फ़रियाद
जो पत्नी को ना ले जा पाया
समय पर हॉस्पिटल
और रास्ते में ही
दम तोड़ दी थी वह
पहले बच्चे को जन्म देते हुए।



जब भी
लिखा जाएगा
शहर का इतिहास
रखे जायेंगे
हाशिये के पार

कुछ लोग।

11 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चाई उजागर कर दी आपने रचना के माध्यम से.

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  2. प्राचीरों की नीव में
    द्फ्ने
    सपनो
    हंसी
    पसीनो का
    कोई हिसाब
    नहीं होगा
    हां
    हिसाब होगा
    सीमेंट अस्पताल बोरियों का.....

    शब्दों में धार है और गहरी पकड़ भी ......सशक्त रचना ......!!

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  3. नहीं सुनी जायेगी
    चौकीदार की फ़रियाद
    जो पत्नी को ना ले जा पाया
    समय पर हॉस्पिटल
    और रास्ते में ही
    दम तोड़ दी थी वह
    पहले बच्चे को जन्म देते हुए।
    बहुत बेहतरीन प्रस्तुती.मन के भाव कितनी सहजता के साथ सामने आये है.जीवन का सत्य यही है उसे ऐसे ही स्वीकारना पड़ेगा पर ऐसा न हो इसके लिए प्रयत्न शील भी होने की जरुरत है

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  4. नीवं के पत्थरों की नीयति ही है दफ़न होकर सतह पर खड़ी ईमारत को ताकत और संबल प्रदान करना.अगर हासिये पर लोग नहीं रखे जायेंगे तो न तो सहर होगा और न ही शहर का इतिहास.इस सचका कोई विकल्प नहीं है.जीवन की सच्चाई को बयां करती एक बेहद सुंदर रचना .

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  5. प्राचीरों की नीव में
    द्फ्ने
    सपनो
    हंसी
    पसीनो का
    कोई हिसाब
    नहीं होगा
    हां
    हिसाब होगा
    सीमेंट की बोरियों का।

    आक्रोश उस समाज के प्रति जो आज को एक धुंधले इतिहास मे बदलता देख रहा है पर कुछ कर नहीं रहा उसके संगरक्षण के लिए... बहुत सटीक रचना है...

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  6. कोई हिसाब नहीं होगा
    चट्टानों के बोझ के नीचे
    उपजे बावासीरों का
    चोट करती रचना, अलग से बिम्ब
    बहुत सुन्दर

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  7. सच में अरुण जी यथार्त की कडवी सच्चाई को अपने उन्नत प्रवाह और शब्दों की तीखी लय से जो आपने बंधा है अदभुद है
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  8. पहली बार आपको पढ़ा है !
    मार्मिक !
    हां लगता है अच्छे दिल के इन्सान हो !
    सादर

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  9. सुन्दर रचना है ! बधाई ! यथार्थ का सही चित्रण है । दुनिया ऐसी ही है, यहाँ लढते और मरते हैं सेना पर जीतता है सिकंदर !

    मेरे ब्लॉग पर आकर टिपण्णी देने के लिए शुक्रिया ! दुबारा ज़रूर आइयेगा !

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