शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

प्रेम का महाकाव्य

मन की स्लेट

पर

अंकित कर दूं

प्रेम का

महाकाव्य ।

सांसो के छंद

से करू

अनुराग ।

मुक्त है आज ज्यो आकाश

त्यों है प्रेम का इतिहास

मिल रहे हैं

जैसे क्षितिज

तेरा मेरा सान्निध्य ।

गीत तुम

कविता तुम

तुम ही सब

अलंकार

प्रेरणा सृजन

की तुम

भाव से करू अभिसार ।

मुरली तुम

वीणा तुम

तुम समय की सितार

वादक निपुण

नहीं मैं

कैसे करू

सुर श्रृंगार ।

ह्रदय के दीप में

सांसो की बाती है

तिल तिल जलूं

तेरे लिए

यही मेरी थाती है ।

स्मृतियों में जब

कभी

मेरा हो स्मरण

दामिनी सी इक

हंसी

करना मुझको

भी समर्पण ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अरे वाह्……………सच प्रेम कितना गहन है………………………कितने ही काव्य लिख लिये गये मगर हर बार एक अलग ही रूप मे नज़र आता है………………बहुत खूब्।

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  2. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  3. वाह !!!!!!!!! क्या बात है..... बहुत जबरदस्त अभिव्यक्ति अच्छे लगे सांसो के छंद

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  4. prem ke ijahar ka yah anutha roop dekhane ko mila
    bahut hi bhavparak avam sundar abhivykti se paripurn rachna.
    poonam

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