बुधवार, 1 सितंबर 2010

कृष्ण कैसा यह विलाप

कृष्ण
पुरुषोत्तम नहीं थे
तुम
तभी तुमने
दिखाया
सत्य के परे भी
है अस्तित्व
सत्य से च्युत हो भी
संभव है विजय

सजा है
फिर से वही दरबार
नगर नगर
द्रौपदियां सहज हो
स्वीकार कर रही हैं
दुर्योधन का प्रस्ताव
शकुनि हो गया है
बहुराष्ट्रीय

फिर
कैसा यह विलाप
आज जब
नए महाभारत के लिए
तैयार है
कुरुक्षेत्र
अर्जुन
नहीं है द्वन्द में
भीष्म को
नहीं है कोई प्रायश्चित
कौरवों की ओर होने का
और स्वयं तुमने
बदल लिया है पाला
दुर्योधन की ओर से
खड़े हो तुम

सब कुछ
बदल गया
कृष्ण
लेकिन
नहीं बदली राधा
प्रभावित
नहीं कर पाया उसे
तुम्हारा बीज मंत्र
"कर्मण्ये वा..."
उसे अब भी
इच्छा है
फल की

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
    बहुत बढ़िया ! उम्दा प्रस्तुती!

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  2. यकीनन कृष्ण पुरुषोत्तम नहीं थे -तभी तो वह अधिक मानवीय थे .
    राधा राधा थीं -कोई किसी जैसा या किसी के अनुरूप कैसे हो सकता है .कविता बढिया है .

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  3. कृष्ण प्रेम मयी राधा
    राधा प्रेममयो हरी


    ♫ फ़लक पे झूम रही साँवली घटायें हैं
    रंग मेरे गोविन्द का चुरा लाई हैं
    रश्मियाँ श्याम के कुण्डल से जब निकलती हैं
    गोया आकाश मे बिजलियाँ चमकती हैं

    श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

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  4. बहुत सटीक अभिव्यक्ति ...

    जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ

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  5. बहुत अच्छी कविता,सटीक अभिव्यक्ति जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

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