सोमवार, 13 सितंबर 2010

गोबर

गोबर
हूँ मैं
कहा
जाता रहा है
बचपन
के दिनों से
जवानी के दिनों तक
और अब
बच्चे भी कहते हैं
उम्र के ढलान पर

गोबर
वही गोबर
जो गाय देती हैं
नाक सिकोड़ कर
निकल जाते हैं हम
उठा कर अपने पैर
नज़र चुराते बच्चों की तरह
लांघ कर

सदियों
से
प्रवृत्ति रही है
मुझे उठा कर
अलग
रख दिए जाने की
खेतों में दबा दिए जाने की
सड़ कर
उपयोगी बन जाने की
अजीब सी खूबी है
है मुझमें

पवित्र भी माना गया है मुझे
लीपा गया है मुझसे
आँगन घर
दालान
पूजा घर
लेकिन तभी तक
जब तक कि
नहीं चढ़ा है
प्लास्टर पत्थर का
घर और आँखों पर

इन दिनों
बहुत बदलाव आ रहा है
बाजार जो आ गया है
इसके आने से
प्रतिष्टित हो गया हूँ मैं,
हो गया हूँ
पर्यावरण मैत्रीय
और प्रीमियम भी

वही पवित्र किन्तु बदबूदार गोबर
हो गया हूँ
'आर्गेनिक '

ए़क विचलित कर देने वाली
सम्वेदना गई है
मेरे प्रति
'ओल्ड एज होम ' में रहने वाले
माता पिता की तरह
गोबर जो हूं मैं

16 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कविता ने प्रतीक के माध्यम से जिन जीवन मूल्यों की चर्चा और चिंता की है वह सराहनीय है ..., बहुत बहुत बधाई ।

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  2. मानवीय त्रासदी एवं मानव मूल्यों के संधर्ष को एक नई आवाज तथा पहचान देती यह कविता अच्छी लगी। इसका बिम्ब जिन्दगी को एक नए नज़रिए से देखने की ताक़त देता है। बल्कि यों कहूं कि इसमें ज़िन्दगी के संघर्ष का सौंदर्य बोध दिखाई देता है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

    भारतेंदु और द्विवेदी ने हिन्दी की जड़ें पताल तक पहुँचा दी हैं। उन्हें उखाड़ने का दुस्साहस निश्‍चय ही भूकंप समान होगा। - शिवपूजन सहाय

    हरीश प्रकाश गुप्त की लघुकथा प्रतिबिम्ब, “मनोज” पर, पढिए!

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  3. अंधी भौतिकतावाद में हो रहे मानवीय मूल्यों के ह्रास पर कठोर व्यंग्य. अंतिम पंक्ति के उपमा में नवीनता तो है परन्तु आद्योपांत कविता के भाव के साथ तारतम्यता में कुछ कसर सी रह गयी लगती है ! रचना के भाव संवेदना को कुरेदते हैं. धन्यवाद !!

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  4. एक टिपण्णी से मन नहीं भरा. अंतिम पंक्ति पर आकर ऐसा लगा कि बात कुछ जमी नहीं..... ! वैसे आज हिंदी दिवस है और मुझे लगता है कि यह कविता (गोबर) हिंदी के अधिक समीप है. उसी तरह पुरातन और पवित्र किन्तु आँखों पर चढ़े आधुनिकता के पत्थर ने इसकी उपयोगिता को बिसरा दिया किन्तु जब बाजार को जरूरत हुई उसी को आज ओर्गानिक खाद बना कर बेच रहा है. राय जी, आपका गोबर सिरोधार्य है !!

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  5. इस कविता में गोबर एक बहुत आम बहाना ठहरा है.. लोकप्रिय वास्तु के बहीं अरुण बाबू अपनी बात पाथावार्ग के बीच चिंतन हेतु रखने में माहिर होते जा रहे हैं. जो मुद्दे बंद कमरों में होती बैठकों और सेमीनार जैसे औपचारिक आयोजन के बाद सारांशत; निकलते हैं.इसा निष्कर्ष उनकी कविताओं में बहुत आसानी से आ निकलता हैं.समाज और संस्कृति की बाकी चिजों पर हम पहली ही सोच विचार करें इससे पहले कि वे गोबर की तरह ऑर्गेनिक खाद बनकर हमारे सामने किसी नए रूप में आए.बधाई.

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  6. you have gain the expertise in writing on any of the topic which is good sign. For your growth as an writer is it good and as an reader it gives us immense pleasure to read on various topic with soul intact...

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  7. आज सचमुच मुझे नहीं पता की क्या लिखना चाहिए.!!!! इतनी भी हिंदी नहीं जानती की इस पोस्ट पर कुछ लिखूं.

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  8. के कहता है कि आप गोबर हैं..आप त गनेस हैं हमरे लिए... ई कबिता के माध्यम से जो आप परम्परागत मूल्य के क्षरन होने का बर्नन किए हैं उससे इंकार किया ही नहीं जा सकता... जमाना एंडोर्समेंट का आ गया है..एगो ब्रांड एम्बैसेडर बना लीजिए त सभे गोबर बनने को तैयार हो जाएगा.. बहुत सुंदर रचना!!

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  9. प्रतीकात्मक शैली मे सारा दर्द बयान कर दिया………………सब अपनी जरूरतों के हिसाब से प्रयोग किये जाते हैं फिर चाहे रिश्ते हों या वस्तु।

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  10. अरुण जी,
    बधाई | "गोबर" के प्रतीक से आपने मानव जीवन की पीड़ा को बखूबी निभाया है | मैंने एक निबंध में मिट्टी को प्रतीक बनाकर लिखा था | यह सब हमारे मूल में है, संस्कार में है |

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  11. ए़क विचलित कर देने वाली
    सम्वेदना आ गई है
    मेरे प्रति
    'ओल्ड एज होम ' में रहने वाले
    माता पिता की तरह

    ऐसी संवेदना माता पिता के प्रति भी आ जाये ...

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  12. इन दिनों
    बहुत बदलाव आ रहा है
    बाजार जो आ गया है
    इसके आने से
    प्रतिष्टित हो गया हूँ मैं,
    हो गया हूँ
    पर्यावरण मैत्रीय
    और प्रीमियम भी
    वही पवित्र किन्तु बदबूदार गोबर
    हो गया हूँ 'आर्गेनिक '

    विशुद्ध ग्रामीण उपमानों के माध्यम से बखूबी कह गए हैं बाजारवाद की हमारी जिंदगी में बढती दखलंदाजी को .सटीक कविता .

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  13. अरुण जी,
    बधाई |
    वाह क्या बात कही है

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  14. old age home mein rahne wale mata pita ki tarah gobar....
    sara dard vyakt karti hui kavita !!!
    a metaphorical poem that says a lot about the changing perspectives!!!
    regards,

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  15. वर्तमान में गोबर जैसी उपेक्षित मान लिये वाली चीज़ को प्रतीक बना कर जीवन मूल्यों पर अच्छी कविता

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