शनिवार, 11 सितंबर 2010

सीढियां

देखा है
कभी सीढ़ियों को
जीवन सी लगती हैं
धरती पर रख कर पाँव
आसमान की ओर बढती हैं

बहुत अनुशासित होते हैं
सीढ़ियों के कदम
नपे तुले

दृढ होते हैं
सीढियों के भाव
और पता होता है
उन्हें अपना लक्ष्य

सीढियां
कभी थकती नहीं
चाहती हैं
मिले तुम्हें
मंजिल

धैर्य का
दूसरा नाम होती हैं
सीढियां
जो मंजिल तक तो
पहुचाती हैं
लेकिन
हिस्सा नहीं बन पाती
मंजिल तक पहुँचने की ख़ुशी का

सीढ़ियों की पीठ पर
चढ़ कर
पहुँच जाते हैं लोग
कहाँ से कहाँ
और नहीं मालूम उन्हें
उनका अपना महत्व

बिल्कुल
तुम्हारी तरह

भले ही छू लिया हो
तुमने आसमान
धरती से टिके हैं
तुम्हावे पाँव
सितारे भरे हैं
झोली में
लेकिन
अभिमान का
कोई पुच्छल तारा
नहीं दिखा
तुम्हारे वहां

वटवृक्ष सा
भावों को आश्रय देती हो तुम
किन्तु
दर्प का कोई धूप
नहीं आया
तुम्हारी आँचल की छाँव से

ए़क सीढी
मेरे लिए भी
गढ़ दो कि
छू लू
मैं भी
थोडा आसमान
कर दो निर्धारित
उसका लक्ष्य
जो जाता हो
तुम तक

21 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha sidiya ..sabko manjil tak pahunchati hai bina kisi bhed ke..aur khud wohi tathsth rahti hai sadaa.

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  2. जब तक सीढियां है तब तक मंजिल की आस है...

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  3. गुलज़ार साहब फरमा गए हैं कि वहाँ तक सीढी नहीं रास्ते पहुँचते हैं...कई मोड़ों से गुजरकर!!
    सीढी का जो ब्याख्या आप प्रस्तुत किए ऊ बिल्कुल सही है!! अऊर आपका लेखन गजब का है!!

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  4. ए़क सीढी
    मेरे लिए भी
    गढ़ दो कि
    छू लू
    मैं भी
    थोडा आसमान
    कर दो निर्धारित
    उसका लक्ष्य
    जो जाता हो
    तुम तक
    ...
    is chaah mein prem, vishwaas,sukun sabkuch hai

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  5. सीढ़ियों की पीठ पर
    चढ़ कर
    पहुँच जाते हैं लोग
    कहाँ से कहाँ
    बहुत सटीक बात रख दी है आपने सीढियो मे माध्यम से। आप एक समर्थ सर्जक हैं। आपके संकल्‍प और चयन की क्षमता से आपकी रचनाधर्मिता ओत-प्रोत है।
    बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

    देसिल बयना – 3"जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!", राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

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  6. ए़क सीढी
    मेरे लिए भी
    गढ़ दो कि
    छू लू
    मैं भी
    थोडा आसमान

    खाली सीढ़ी गड़ा लेने भर से
    काम ना चलेगा...
    रखने होंगे
    साध साध कर
    कदम तो
    तुम ही को..
    सयम तो रखना होगा..
    विवेक से संभालना होगा तुम्ही को.

    अरुण जी बहुत खूबसूरत रचना. बधाई.

    हर पल होंठों पे बसते हो, “अनामिका” पर, . देखिए

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  7. कम ही कवितायेँ मुझे एक बार में ही पूरी समझ आ जाती है ... सरल शब्दों में प्रभावशाली अभिव्यक्ति..

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  8. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
    कल (13/9/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
    और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  9. सीढियाँ ही तय करती हैं जीवन का लक्ष्य्……………बहुत गंभीर बात कह दी…………………जीवन के पथ पर मिलने वाले ना जाने कितने लोग हमारे पथप्रदर्शक बनते हैं और मंज़िल की ओर अग्रसित करते हैं फिर चाहे वो माँ हो या गुरु या हमसफ़र्……………इस कविता मे कितने ही भावों की पुष्टि होती है।

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  10. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....कदम दर कदम सीढियां मंजिल तक पहुंचाती हैं ...तय आपको करना है की किस मंजिल को पाना है ...

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  11. शानदार प्रस्तुति - अनूठी सोच और विषय होते हैं आपकी रचनाओं में.

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  12. मंजिल तक सहारा देने वाला थकेगा भी कैसे?

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  13. धैर्य का
    दूसरा नाम होती हैं
    सीढियां
    जो मंजिल तक तो
    पहुचाती हैं
    लेकिन
    हिस्सा नहीं बन पाती
    मंजिल तक पहुँचने की ख़ुशी का
    bahut mehnat se banai gayee hai ye sidhi.aage bhi banate rahiye.sunder hai.

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  14. वटवृक्ष सा
    भावों को आश्रय देती हो तुम
    किन्तु
    दर्प का कोई धूप
    नहीं आया
    तुम्हारी आँचल की छाँव से
    inhein mool se jodkar dekhne ka prayas karein.aik deviation sa lagata hai,ho sakta hai main galat houn.

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  15. ए़क सीढी
    मेरे लिए भी
    गढ़ दो कि
    छू लू
    मैं भी
    थोडा आसमान ...

    बहुत खूब ... सीडी के दर्द और उसकी टिके रहने की क्षमता को बखूबी प्रेम का मोड़ दे दिया है ... लाजवाब ...

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  16. अतिसुन्दर मुग्धकारी रचना...
    आपकी लेखनी ने नतमस्तक कर दिया !!!
    और क्या कहूँ ,कुछ सूझ ही नहीं रहा...

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  17. बहुत अच्छी प्रस्तुति अनूठी सोच खूबसूरत रचना. बधाई.

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