सोमवार, 20 सितंबर 2010

जरुरी नहीं शब्द

चुप हो तुम
चुप हैं हम
लेकिन बाते हैं
जो रुक ही नहीं रहीं ।

कह नहीं रही
तुम कुछ
कह नहीं रहा
मैं कुछ
लेकिन
कुछ बाकी नहीं
कहने को ।

इसलिए तो
कहते हैं
कहने के लिए
शब्द जरुरी नहीं
और
जरुरी नहीं कि
हो कोई भाषा
हो कोई बोली
हो कोई व्याकरण ।

बिना शब्द भी
बोलती हैं हवाएं
गुनगुनाती हैं तितलियाँ
पुकारते हैं पत्ते

और तुम्हारी आँखे
कहती हैं मन की बातें ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. चुप तुम रहो, चुप हम रहें
    खामुशी को, ख़ामुशी से, बात करने दो!!
    मौन के सम्वाद सबसे मुखर होते हैं!

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  2. ज़रूरी नहीं शब्द ...पर मौन तो बड़ा वाचाल होता है .सक्रिय भागीदारी से बचने की खूंखार साजिश .कायरता पर तटस्था का आवरण ..चालाक बगुले का एक अचूक आखेटक हथियार .
    चुप रहना ...चुप कर दिए जाने का निर्लज्ज प्रदर्शन तो नहीं -एक बेशर्म आड़
    जो भी अरुण यह कविता अनेक कविताओं के बीज अपने में समाहित किये है .बधाईयाँ.

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  3. shabdo ki koi bhasha nahi hota...:)

    kya idea hai sir jee........:D

    Idea ka advertisement yaad aa gaya:)

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  4. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

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  5. मौन के शब्द ऐसे ही होते हैं ..सुन्दर अभिव्यक्ति

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  6. वाह !!!! वाह !!!!!
    इसलिए तो
    कहते हैं
    कहने के लिए
    शब्द जरुरी नहीं
    और
    जरुरी नहीं कि
    हो कोई भाषा
    हो कोई बोली
    हो कोई व्याकरण
    "और न कोई प्रितिक्रिया"
    ये आप लिखना भूल गए शायद. मैं भी चुप रहूंगी कोई प्रतिक्रिया नहीं दूंगी. आप तो मौन पढना अच्छी तरह जानते हैं. है न....

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  7. वाह...बेजोड रचना है ये आपकी...बधाई..

    नीरज

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  8. आँखों की बातों में न जाने कितने भाव छिपे हैं।

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  9. moun bahut shaktishalee hai............
    bahut sunder rachana......
    Aabhar

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  10. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    काव्य प्रयोजन (भाग-९) मूल्य सिद्धांत, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

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