शनिवार, 18 सितंबर 2010

आखिर मर ही गया बुधना

मेरे गाँव में
ए़क है
बुधना
कई पीढ़ियों से
बदला नहीं बुधना का नाम
बुधना के बेटे का नाम भी
रखा गया बुधना ही
क्योंकि
बदलना नहीं था
बुधना का प्रारब्ध

कहते हैं
सदियों से
बुधना है
खेतों में
खलिहानों में
आम के बगीचों में
बांस की बीट में
तालाब में
मर मर कर भी
नहीं मरा है
बुधना

सदियों से
उसकी पीठ
झुकी की झुकी ही है
खाल
उधडी की उधडी
मालिकों की पीढियां बदली
चेहरे बदले मालिकों के
बदला समय का तेवर भी
लेकिन
नहीं बदला बुधना,
बुधना का प्रारब्ध

प्रकृति और
भाग्य के सभी नियम
लागू नहीं होते थे
बुधना पर

उपजाने वाले
बुधना के हिस्से
नहीं आयी कभी

पूरी रोटी ,
हवेलियो में
चैन की नींद देने वाले
बुधना के
हिस्से
नहीं आयी कभी

आँख भर नींद

बुधना
मरा सौ सौ बार
कभी
बाप के मरने पर
माँ के साथ जबरदस्ती पर
बेटे के पहली बार बन्धुआगिरी पर
फिर भी नहीं मरा बुधना

पहली बार
बुधना को लगा
नहीं बदल सकता
बुधना का प्रारब्ध

जब
उसके बीच के बुधने ने
उसी के हाथ का
नहीं पिया पानी

उसी के बेटे को
लगाया बन्धुआगिरी पर

उसी के हिस्से का आसमान
रख दिया गिरवी,
जाकर रहने लगा
उसी ड्योढ़ी में
जहाँ सदियों से
कर रहा था बुधना

चौकीदारी

आखिरकार
मर ही गया

बुधना
ए़क बुधना के ही हाथों ।

15 टिप्‍पणियां:

  1. अरुण जी बुधना का प्रतीक लेकर वर्ग-भेद की ऐसी मार्मिक तस्वीर पेश करने के लिए धन्यवाद .आपने तो अनायास ही प्रेमचंद की रचना "कहीं धूप,कहीं छाया" की याद ताजा करा दी .बेहतरीन रचना के लिए साधुवाद.

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  2. पन्कज त्रिवेदी जी ()ने ईमैल से कहा :

    "वाह अरुण जी,
    क्या बात है?
    मैंने इसी विषय पर एक निबंध गुजराती में लिखा था, जिसका नाम - "बुधियो" !

    इसी स्टाईल में... मगर वो गद्य में...
    जैसे कि - बुधियो यानी बुद्धू... बुधिया खिड़की में बैठा रहता | बुधिया किसी के साथ बात नहीं करता क्यूंकि वह बुधिया था, बुधिया यानी बुद्धू...

    ऐसा कुछ था | करीब ५-६ साल हुए |

    कव्तिया बहुत ही अच्छी, गहराई वाली है... "

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  3. भाई जी!ई त एकदम स्तब्ध कर देने वाला बात कहे हैं आप..

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  4. कविता में बुधना के मार्फत अपनी संस्‍कृति की ही चिंता है। कविता का एक रेखीय पाठ तो यह है कि यहां चिंता बुधना के मरनी-जीने की है लेकिन वास्‍तव में यह चिंता अपनी मिटती हुई संस्‍कृति की है। इसे नत्‍य साम्राज्‍यवाद ने चकाचौंध की एक ऐसी दुनिया हमारे सामने फैलाकर रख छोड़ी है कि हम इनकी संस्‍कृति में फंसते चले गए है और हमारा मूल नष्‍ट होता चला गया है।

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  5. बुधना भला कब मरता है..बुधना था..बुधना है..बुधना रहेगा...बुधना व्यक्ति नहीं, एक सोच है...

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  6. हाय बुधना तेरी हर युग में यही कहानी..

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  7. budhana ke madhyam se samaj ki visnagtiyo,aur budhna ke budhna bane rajne aur kuchh aur ho jane ki prabhavpoorn abhivyakti...badhai....

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  8. बुधना के माध्यम से जो सच की तरफ़ आपने ध्यान दिलाया है वो सराहनीय है…………कुछ कर्म पीढी दर पीढी चलते चले जाते हैं और अपनी निशानियाँ हस्तांतरित करते जाते हैं क्योंकि यही तो उनकी धरोहर होती है…………एक गरीब अपने अभिशप्त जीवन मे से कौन सा खज़ाना अपने बच्चों के लिये छोड कर जा सकता है फिर चाहे वो कर्ज़ हो या बँधुआगिरि……………यही तो उसकी वसीयत होती है और यही उसकी धरोहर्…………………इस त्रासदी को आपने बखूबी उकेरा है।

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  9. क्या कहूँ ???अब कहने को बचा ही क्या है.
    सब कुछ तो बुधना ने ही सिसक सिसक कर कह दिया मैं तो अपने आस पास हवा में उसके आंसुओं की सीलन महसूस कर रही हूँ

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  10. न जाने ऐसे कितने बुधना हैं ..यह मर नहीं सकते ...पीढ़ी दर पीढ़ी यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है ...विचारोत्तेजक रचना ..

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  11. शहरो के बुधना के प्रारब्ध बदल गए हैं..पेट भरे हैं..और आँखे भी मक्कारी से भरी हैं आज शहरों के बुधना की...आज शहर के बुधना तो मालिकों को आँखे दिखाते है और उन्हें छोड़ जाने की धमकी देते हैं...

    पहले से कुछ तो हालात गाँव के बुधना के भी बदले होंगे.

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  12. आज के चर्चामंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  13. आखिरकार
    मर ही गया
    बुधना
    ए़क बुधना के ही हाथों ।
    arunarun jee
    नमस्कार !
    budhiya aadi kaal me bhi bhi janam leta tha aur aage bhi leta rahega ,bas wo roop badalta rahata hai .
    badhai !

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