सोमवार, 14 मार्च 2022

सुखद हरा रंग


पत्तों पर
कभी देखा है
धूप को टिकते हुए..
पत्तों का रंग
कितना सुखद हरा
होता है ।

ये हरीतिमा
प्रतीक है
जीवन की
सुख और
शांति की
वैभव और
समृद्धि की ।

हरियाली लाती है
सन्देश
भरपूर है चराचर
और अपनी सृष्टि
साँसे ले रही
तरुणाई
हो रही
पतझड़ की भरपाई ।

इसी हरे रंग में
समाई है
जीवन की उर्जा
ऊष्मा और
इसमें ही
रमी
रिश्तों की नमी ।

कभी देखना
मेरा चेहरा भी
तुम्हारी आभा से
कैसे खिल जाता है
और हो जाता है
सुखद हरे रंग जैसा ।

वही हरा रंग
जो ओढती हो तुम
पहनती हो
वही हरा रंग
जो जीवंत है
तुममें ।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

महानगर में बसंत

महानगर में बसंत 

सड़कों के किनारे लगे

बबूर, कीकर के वृक्षों  के काले पत्तों के बीच 

अपुष्ट खिले बेगनबेलिया से 

झाँकता है और 

घुल जाता है झूलते अमलताश की यादों से जुड़ी 

गांवों की स्मृतियों में ।  


महानगर में बसंत 

दस इंच के गमलों में माली द्वारा लगाए गए 

अकेली गुलदाउदी के अलग अलग कोणोंसे 

खींचे गए फोटो और सेलफियों को सोशल मीडिया के 

विभिन्न प्लेटफॉर्मों  पर किए गए अपडेट से 

झाँकता है और 

घुल जाता है आमों की नई मंजरियों की गंध से जुड़ी 

गांवों की स्मृतियों में । 


महानगर में बसंत 

वास्तव में उन्हीं के हिस्से आता है 

जो सुबह होने से पहले पार्कों की सफाई करते हुये 

गिरे हुये फूलों को देख हिलस उठते हैं 

जो शहर की नर्सरियों में भांति भांति के नन्हें नन्हें पौधों  को

नहाते हैं, धुलाते और सजाते हैं 


महानगर में बसंत 

पौधे बेचने वालों के ठेले पर रखे गमलों के समूह में 

होता है अपने उन्मान पर । 

सोमवार, 31 जनवरी 2022

जादुई भविष्यवक्ता

अमरीकी कवयित्री  सारा ट्रेवर टीसडेल  (1884-1933) की कविता द क्रिस्टल गेजर का हिन्दी अनुवाद अरुण चन्द्र राय द्वारा । 


मैं स्वयं को फिर से स्वयं में  लूँगी समेट 

मैं अपने बिखराव को एक कर दूँगी खुद को  भेंट 

उन्हें  मिलाकर गढ़ लूँगी एक अद्भुद प्रकाश पुंज  

 जहां से निहारूंगी मैं चांद और  सूरज का कुंज 


घंटों निहारूंगी समय को जैसे कोई जादूगरनी 

भविष्य  और वर्तमान की घूमती हो जैसे घिरनी 

और बेचैन लोगों की उतरूँगी मैं तस्वीर 

आत्ममुग्ध होकर फिर रहे  होकर जो अधीर 

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 

जन गण मन  का पर्व चुनाव 

गणतन्त्र का मर्म चुनाव 

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 


जाति की बंधन तोड़ो 

धर्म का भेद छोड़ो 

अपने मुद्दों को पहचानो 

मत छोड़ो मजधार में नाव  

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 

गणतन्त्र का मर्म चुनाव 


लोक लुभावन वादों को छोड़ो 

असली मुद्दों से नाता जोड़ो 

रोजी रोटी का न हो तनाव 

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 

गणतन्त्र का मर्म चुनाव 


अमीर गरीब को समान अधिकार 

सबको धंधा सबको रोजगार 

न हो किसी को कोई अभाव 

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 

गणतन्त्र का मर्म चुनाव 


सोमवार, 17 जनवरी 2022

अमेरिकन कवयित्री ग्वेन्डोलिन ब्रूक्स की कविता "द क्रेज़ी वुमेन" का अनुवाद

अमेरिकन कवयित्री  ग्वेन्डोलिन ब्रूक्स की कविता "द क्रेज़ी वुमेन" का  मूल अँग्रेजी से अनुवाद अरुण चन्द्र रॉय द्वारा 


मैं नहीं गाऊँगी मई का गीत 

मई के गीत मे होना चाहिए मनमीत 

मैं करूंगी नवम्बर के आने का इंतजार 

और गाकर करूंगी उदासी का इज़हार 


मैं करूंगी नवम्बर तक प्रतीक्षा 

तभी पूरी होगी मेरी आंकक्षा 

मैं धुंध अंधेरे में बाहर जाऊँगी 

और ज़ोर ज़ोर से गाऊँगी 


और दुनिया मुझे घूरेगी 

मुझपर फब्तियाँ कसेगी 

"कहेगी  है यह औरत पागल, है पागल इसकी रीत " 

जो नहीं गाती है मई  में खुशी के गीत। "