1.
छूटना
कुछ और पाने की ओर
होता है चलना
2.
हर चीज जो है
ठीक है छूट जाएगी
इसको समझने में
ठीक नहीं
जिंदगी गंवाना
3.
पानी से
उसका रंग
उसका स्वाद
उसकी तासीर
कब छूटती है!
(बीज शब्द "छूटना": श्वेता कसाना, अनुवादक साथी )
1.
छूटना
कुछ और पाने की ओर
होता है चलना
2.
हर चीज जो है
ठीक है छूट जाएगी
इसको समझने में
ठीक नहीं
जिंदगी गंवाना
3.
पानी से
उसका रंग
उसका स्वाद
उसकी तासीर
कब छूटती है!
(बीज शब्द "छूटना": श्वेता कसाना, अनुवादक साथी )
मां को अब
छोड़ देनी चाहिए सबसे अंत में
खाने की आदत
मां को अब
नहीं छिपानी चाहिए अपनी बीमारी
असह्य हो जाने तक
मां को अब
नहीं रोना चाहिए
अकेले में चुपचाप
मां को अब
मनुष्य हो जाना चाहिए
हाड़ मांस वाला मनुष्य
जिसे भूख लगे, चोट लगे, पीड़ा हो, दर्द हो
हे दुनियां भर की माएं
उतर जाओ देवी के सिंहासन से ।
राजाओं और उनके मंत्रियों के लिए
आवश्यक होना चाहिए यात्राएं अस्पतालों की
दुख और पीड़ा को अनुभव करने का यह सहज स्थान
मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने का सबसे प्रभावशाली साधन है।
उन्हें नियमित रूप से जाना चाहिए
शमशान घाट और कब्रिस्तान भी
ताकि उन्हें सनद रहे आदमी की हदों के बारे में ।
किसी किसान के घर भी
मंत्रियों और राजाओं को जाना चाहिए
जिससे कि उन्हें भान हो जाए कि
दुनिया की सत्ता के सच्चे हकदार कौन हैं ।
बुरा नहीं लगेगा किसी को यदि राजा या मंत्री
उस छोटे बच्चे से मिल आएं जिसने खोया है अपना पिता
सीमा पर हुई गोलीबारी में
जबकि दोनों तरफ के अफसरान कर रहे वार्ता
बड़ी गर्मजीशी से और अंत में मिला रहे थे हाथ
कर रहे थे गलबहियां।
लेकिन राजाओं और उनके मंत्रियों के पास
इन दिनों वक्त नहीं है
वे कर रहे हैं अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर
नए व्यापार के लिए कर रहे हैं करार,
खरीदे जाने हैं नए नए हथियार
उन्हें क्या ही फर्क पड़ता है कि
पड़ रहे हैं पहाड़ों में दरार,
बढ़ गया है गांवों और शहरों का तापमान
या झीलों में नहीं आ रहे हैं चिड़िया के रूप में
विदेशी मेहमान।
सड़क होने का अर्थ
मंजिल का होना नहीं होता है
पानी होने से बुझ जाए प्यास
कब होता है ऐसा।
बादल घूमडेंगे तो बरसेंगे भी
हर बार ऐसा नहीं होता है
रोपे गए हर बीज से प्रस्फुटित हो पौध ही
ऐसा भी कब हुआ है ।
आपके पास शब्द हैं
और आप लिख सकें कविता
हो जाए क्रांति
कर सकें प्रतिरोध
कहां होता है संभव ऐसा भी।
आप प्रेम करें और
मिले बदले में प्रेम
आप समर्पित रहें और
मिले आपको भी समर्पण
यह भी कहां हुआ है संभव !
इधर चैत जल रहा है
और दुनिया गा रही है
बसंत के गीत
खड़ी फसलों के बेमौसम बरसात में
गिर जाने के खतरे के बीच
लोग शोक मना रहे हैं गिरे हुए पत्तों पर
और ये ऐसे लोग हैं जिन्हें
शाख से गिरे हुए पत्तों एवं
पके हुए फसलों के बेमौसम बारिश में गिरने के बीच का फर्क
नहीं है मालूम।
नदियां और पोखर गए हैं सूख
बढ़ती ही जा रही है लोगों की भूख
जबकि पेट की भूख जस की तस बनी हुई है
एक भूख को श्रेष्ठ बताने के लिए चलाए जा रहे हैं
संगठित अभियान
और एक भूख को लगातार किया जा रहा है
मुख्यधारा से ओझल
भूख और भूख के बीच के फर्क के प्रति अज्ञानता ही
सुखा रही है नदियां और पोखर
काश कभी जान पाते आप और हम।
चैत को नहीं जलना चाहिए
नदियों को नहीं सूखना चाहिए
पोखरों को जिंदा रहना चाहिए
और भूख पर लगाम लगानी चाहिए
यह केवल नारा भर है जिसे एक साथ पोस्ट किया जाना है
विभिन्न मीडिया मंचों पर।