बुधवार, 4 अगस्त 2010

लहर

लहर
ए़क बार
ऊपर उठती है
और
दूसरी बार
जितनी उठती है ऊपर
उतनी ही
जाती है नीचे भी

मन के भाव भी हैं
लहर के समान
जब तुम
होते हो पास
यह ऊपर उठती है
ख़ुशी के आवेग से
और जब
तुम्हारे दूर होने का
आता है ख्याल
मन में
यह उतनी ही
चली जाती है नीचे
अवसाद से

मन की
लहरों को
किसी 'लेम्डा' से
मापा भी नहीं जा सकता
ना ही है कोई
दूसरी इकाई

तुम्हारे सिवा

लहर
जो मन के भीतर है
तुम तक
पहुँच रही है क्या !

16 टिप्‍पणियां:

  1. लहर
    हरहरा कर
    आती है
    जाती है

    पर मन को
    सदा हरा
    कर जाती है

    जबकि
    हरापन
    पर्यावरण की
    थाती है।

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  2. मन के
    लहरों को
    किसी 'लेम्डा' से
    मापा भी नहीं जा सकता
    ना ही है कोई
    दूसरी इकाई
    तुम्हारे सिवा
    अद्भुत! अभिव्यक्तिओं के नए आयाम गढती आपकी अभिव्यक्ति मन को छू गई।

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  3. लहर
    जो मन के भीतर है
    तुम तक
    पहुँच रही है क्या !
    जब इतनी शिद्दत से लिखते हैं तो कैसे नही पहुँचेगी…………………एक बेहद भावप्रवण अभिव्यक्ति।

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  4. लहर
    जो मन के भीतर है
    तुम तक
    पहुँच रही है क्या !
    awesome!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन के भाव भी हैं
    लहर के सामान
    जब तुम
    होती हो पास
    यह ऊपर उठती है
    ख़ुशी के आवेग से
    और जब
    तुम्हारे दूर होने का
    जब आता है ख्याल
    मन में
    यह उतनी ही
    चली जाती है नीचे
    अवसाद से..... bahut sundar bhaw

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  6. bahut umda rachna hai... bhavnaon ke sagar mai gotee khati dil ki kashti lehro ke adeen bahe ja rahi hai...

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  7. आपकी कविता पढ़कर आपके मन की लहरों को तो अब लाइट ईयर से नापने का समय आ गया है।

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  8. एक बेहद भावप्रवण अभिव्यक्ति।

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  9. इतना सब कुछ कहने बाद ये संशय क्यों की
    "लहर
    जो मन के भीतर है
    तुम तक
    पहुँच रही है क्या !"

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