बुधवार, 18 अगस्त 2010

सुस्ता रही धूप ओसारे पर

मन का पेड़
हरा हो गया है
नव पल्लव
आ गए हैं
इसकी शाखों पर
देखा जो तुमने
ए़क बार
नेह के जल से
सींचा इसकी जड़ों को

इन्द्रधनुष का रंग लिए
विस्तृत आसमान को देख
खुश हो रहे हैं
मन के पेड़ पर
खिले पुष्प
तुमने जो
निहारा इन्हें

हवा इसे
झुला रही है
और हिलोरें
ले रही है
मन की डाल
तुमने जो
झल दिया
अपना आँचल
इसके ऊपर

तुम जो
आयी आँगन
मेरे सावन
देखो धूप भी
सुस्ता रही
ओसारे पर

16 टिप्‍पणियां:

  1. तुम जो
    आयी आँगन
    मेरे सावन
    देखो धूप भी
    सुस्ता रहा
    ओसारे पर.......gr8

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  2. देखो धूप भी
    सुस्ता रही
    ओसारे पर
    ये लाइन तो कमाल है!
    अब इसके बाद कुछ तो मन करता इस ओसारे वाले आंगन में खाटीया डाल कर लेटे रहें.......

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  3. तुम जो
    आयी आँगन
    मेरे सावन
    देखो धूप भी
    सुस्ता रही
    ओसारे पर --
    Bimb ke sahare behad kubsoorati se kiye gaye manvikaran ne kavita ko samane kada kar diya.

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  4. गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

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  5. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

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  6. एक अलग भाव दिया है आपने……………सुन्दर रचना।

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  7. देखो धूप भी
    सुस्ता रही
    ओसारे पर
    बहुत खूबसूरती से संजोया है प्यार का हर इक मोती

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  8. बहुत सुन्दर रचना ...कोमल भावों को कहती हुई

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  9. सुंदर प्रस्तुति!
    राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

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  10. बहुत सुन्दर रचना, very innocent expression, some time it happens that we feel lethargic and nature also give permission to laid back relax...

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  11. : वाह्……………बहुत ही सुन्दर बिम्ब प्रयोग्……………क्या खूब लिखा है………नेह जल के सींचने से ही तो पुष्पित पल्लवित होता है मन का आँ गन ……हर डाल का हरा होना उसी पर तो निर्भर करता है……………।बेहद उम्दा भाव पिरोये हैं और ऐसा लगा जैसे जो मैने रचना लिखी है जैसे उसका ही जवाब आपने लिख दिया हो…………"सावन कितना बरस ले "…………बेहद उम्दा भाव्।

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  12. प्रिय भाई आज पहली बार
    आपके ब्‍लाग पर आना हुआ। आपकी कविताएं पढ़कर लगा कि मैंने आने में देर कर दी। चलिए देर आयद दुरुस्‍त आए। आपकी दो कविताएं अभी ध्‍यान से पढ़ी। एक यही और दूसरी मजदूर औरतों की पीठ। दोनों ही बहुत गहरे तक छूती हैं। पर अन्‍यथा न लें, मुझे लगता है कविताओं में थोड़ी कसावट की जरूरत है। अगर आप खुद ही कविताओं को दो तीन बार बहुत ध्‍यान से पढ़ेंगे तो आपको यह बात समझ आएगी। साथ ही साथ जो बिम्‍ब आप ले रहे हैं,उनकी तार्किकता भी।
    देखिए प्रस्‍तुत कविता में मैंने संपादन का प्रयास किया है। शायद आपको उचित लगे-

    मन का पेड़
    हरा हो गया है
    नव पल्लव
    आ गए हैं
    जो तुमने
    ए़क बार
    नेह के जल से
    सींचा इसकी जड़ों को

    इन्द्रधनुषी रंग लिए
    विस्तृत आसमान देख
    मन के पेड़ पर
    खिल रहे हैं पुष्प
    तुमने जो
    निहारा इन्हें

    हिलोरें
    ले रही है
    मन की डाल
    तुमने जो
    झल दिया जरा
    अपना आँचल
    इसके ऊपर

    तुम जो
    आयी
    मेरे आँगन
    देखो धूप भी
    सुस्ता रही
    ओसारे पर

    उत्तर देंहटाएं
  13. तुम जो
    आयी आँगन
    मेरे सावन
    देखो धूप भी
    सुस्ता रही
    ओसारे पर।

    कितनी सहजता से आप प्रेम को लिखते हैं !

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