शनिवार, 14 अगस्त 2010

सुख की कल्पना

सुख
ए़क भ्रम है
जो अपनी खोज में
गिरा देता है
मानव को उसकी
अपनी ही नजरों में


पाने की लालसा
कर देती है उसे
दिग्भ्रमित
और निर्णयहीन
पशु हावी हो जाता है
और मानव
पहुँच जाता है
अपने आदिम स्वरुप में
बुद्धिहीन विवेकहीन

ए़क ऐसा ही
बुद्धिहीन विवेकहीन हूँ
मैं
सुख की कल्पना में
तिरोहित कर दिया मैं ने
अपना सर्वस्व
स्वयं के पैरों के नीचे की धरा
मैंने स्वयं ही खींच ली है
और बना लिया है
पश्चाताप का दलदल


स्वप्न सारे
हो गए है गंदले
भविष्य लग गया है
दाव पर
मंत्र जो शक्ति थी
अभिशाप बन
उच्चारित हो रही है
प्रतीत हो रहा है
विष सा यह विश्व
अपना ही विश्वास
मार रहा है डंक

ए़क चीख
जो कि
मेरी है
तुम्हारी है
चक्रवात बन
उडा ले जा रहा है
मुझे स्वयं से दूर
तुमसे दूर
किसी निर्जन द्वीप पर
स्वयं को पा रहा हूँ मैं

हे मनु !
कैसा है यह सुख ।
श्रद्धा !
क्या मनु है तुम्हारा
अब भी !

13 टिप्‍पणियां:

  1. हे मनु !
    कैसा है यह सुख ।
    श्रद्धा !
    क्या मनु है तुम्हारा
    अब भी !
    सुख और दुख सापेक्ष हैं. सुखों की तलाश करते करते कहीं हम दुख का जखीरा तो नहीं इकट्ठा करते जा रहे हैं!!

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  2. हे मनु !
    कैसा है यह सुख ।
    श्रद्धा !
    क्या मनु है तुम्हारा
    अब भी !

    एक बार फिर बेहतरीन प्रस्तुति……………सुख की चाह शायद ही कोई ऐसा हो जिसे ना हो मगर खोजता इन्सान बाहर है जहाँ खोजना चाहिये सिर्फ़ वहीं नही खोजता।

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  3. मनु और श्रद्धा हमारा विश्वास हैं , वे कभी अलग नहीं होते
    सुख कस्तूरी है ....

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  4. Eeeshwar kee hi tarah,sukh basta hai man me aur ham use khojte hain poore jahan me!
    Bahut khoobsoorat rachana!

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  5. वाह जी, क्या बात है..बहुत सुन्दर.

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  6. सुख की आस और उसका प्रयास जीवन में यदि अस्थिरता लाये तो मान लीजिये कि सुख की परिभाषा में कहीं कोई खोट है।

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  7. ए़क चीख
    जो कि
    मेरी है
    तुम्हारी है
    चक्रवात बन
    उडा ले जा रहा है
    मुझे स्वयं से दूर
    तुमसे दूर

    सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

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  8. अपने मन के विकारों पर अंकुश , इन्‍द्रियों पर संयम, दुर्गुणों से दूर रहते हुए शरीर व मन को सुव्‍यवस्थित रखना। ऐसा होने पर सच्‍चे सुख की स्‍थापना निश्चित है।

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  9. आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

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  10. क्या बात है अरुण, बहुत ही सुंदर कविता लिखी है बधाई, कविता के लिए और स्वतंत्रता दिवस के लिए भी

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  11. सुख की कल्पना नही उसको मन में बैठाना ही सुख देता है ... बेहतरीन प्रस्तुति है ...

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