शनिवार, 7 अगस्त 2010

ए़क पृथक ब्रह्माण्ड

देह के विज्ञान से परे
प्रेम का ए़क पृथक ब्रह्माण्ड है
जहाँ के ग्रह और नक्षत्र
परिक्रमा करते है
मन के भावों का

सितारे
अपने अपने स्थान पर
टिके होते हैं
दृष्टि के गुरुत्वाकर्षण से
और
साँसों के घर्षण से
होते हैं दिन और रात

हजारो आकाशगंगाएं
गेसुओं से
निकलती हैं
और अधरों के स्पर्श से
प्रकाश पुंज बन
विलीन हो जाती हैं

उस ब्रहमांड की
तुम हो
पृथ्वी
और मैं
सूर्य

15 टिप्‍पणियां:

  1. इतनी सहज और सरल व्याख्या ? और वो भी प्रेम की ! लाजवाब !!!

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  2. उस ब्रहमांड की
    तुम हो
    पृथ्वी
    और मैं
    सूर्य इस कविता का अंत कविता के मिजाज़ के उपयुक्त नहीं है .वैसे कविता अच्छी है .

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  3. आपने तो प्रेम को रेखांकित कर दिया………………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

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  4. "तुम हो
    पृथ्वी
    और मैं
    सूर्य"
    इस प्रस्तुती में मेरे लिए तो जगह है ही नहीं तो क्यों कबाब में हड्डी बनूँ !!!!!!

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  5. देह के विज्ञान से परे
    प्रेम का ए़क पृथक ब्रह्माण्ड है
    जहाँ के ग्रह और नक्षत्र
    परिक्रमा करते है
    मन के भावों का
    adbhut satya

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  6. सितारे
    अपने अपने स्थान पर
    टिके होते हैं
    दृष्टि के गुरुत्वाकर्षण से
    और
    साँसों के घर्षण से
    होते हैं दिन और रात
    samast brhammand ko vyakt kiya aapke prem ne aur prem ko brhamand bana diya...sunder kalpana....

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  7. प्रेम की सुदर परिभाषा गढती हुई एक सुंदर रचना!
    जिसकी कोमल भावनाएं मन को नकारती हुई सीधे दिल में उतर जाती हैं. रचनाकार को मेरी ओर से हार्दिक बधाई!

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