रविवार, 22 अगस्त 2010

गीली चीनी

माँ की रसोई में
चीनी गीली रहती थी
और कह जाती थी
बहुत कुछ

चीनी का
गीला होना
ए़क अर्थशास्त्र की ओर
करता है इशारा
जहाँ मितव्‍य‍तता से
गुजारी है पीढ़िया
जिसकी मिसाल
होती हैं माएं

वर्षो से नहीं बदल सकी
चीनी वाली डिब्बी

जो अब
हवाबंद नहीं रह गए

हवा खाते चीने के डिब्बे
गवाह हैं
हमारे बचपन से
जवा होने तक के
और
कई मीठी स्मृतिया
उभर आती हैं
गीली चीनी से

जब माँ ने
बेचे थे अपने गहने
हमारे परीक्षा शुल्क के लिए
गीली चीनी की मिठास
कुछ ज्यादा ही हो गई थी
माँ के चेहरे के उजास से


वर्षों बाद अब
चीनी तो गीली नहीं रहती
लेकिन
गीली रहती है
माँ की आँखें
गीला रहता है
माँ के मन का आसमान

24 टिप्‍पणियां:

  1. ओह! भावुक कर गई यह रचना...जबरदस्त!

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  2. वर्षों बाद अब
    चीनी तो गीली नहीं रहती
    लेकिन
    गीली रहती है
    माँ की आँखें
    गीला रहता है
    माँ के मन का आसमान

    बहुत बढ़िया .....

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  3. इस कविता में भाषा की सादगी, सफाई, प्रसंगानुकूल शब्‍दों का खूबसूरत चयन, जिनमें ग्राम व लोक जीवन के व्‍यंजन शब्दो का प्राचुर्य है। ये आपकी भाषिक अभिव्‍यक्ति में गुणात्‍मक वृद्धि करते हैं। कविता में भावुक करते शब्दों के प्रासंगिक उपयोग, लोकजीवन के खूबसूरत बिंब कवि के काव्‍य-शिल्‍प को अधिक भाव व्‍यंजक तो बना ही रहे हैं, दूसरे कवियों से आपको विशिष्‍ट भी बनाते हैं। यह कविता एक संवेदनशील मन की निश्‍छल अभिव्‍यक्तियों से भरा-पूरा है। जमीनी सच्‍चाइयों से गहरा परिचय, आपके कवि व्यक्तित्व की ताकत है।

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  4. बहुत-बहुत शुभकामनाएं। चीनी गीली ही रहे।

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  5. बेहद मर्मांतक अभिव्यक्ति………………जीवन की सारी व्यथा समेट दी है।

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  6. जब माँ ने
    बेचे थे अपने गहने
    हमारे परीक्षा शुल्क के लिए
    गीली चीनी की मिठास
    कुछ ज्यादा ही हो गई थी
    माँ के चेहरे के उजास से

    this is brilliant, emotionally charged and evident of our childhood where our parents used work really hard to earn bread and butter for the family and mom used to work like best of the best finance minister and used to do optimum utilization if limited resources...
    With time I forgot those struggling days however your most of the creations takes me to those time and inspire me to work hard to achieve good for the family...

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  7. kavi mann kahan kahan se kya kya gaddh leta hai.......:)

    sach me aap bemishal ho........:)

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  8. लेकिन
    गीली रहती है
    माँ की आँखें
    गीला रहता है
    माँ के मन का आसमा

    ओह ...नम हो गयीं आँखें ...बहुत संवेदनशील

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  9. "bahut khoob,badalte samay ki smridhdhi ke sath reetate bhav ko bayan karti sundar rachna...."

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  10. वर्षों बाद अब
    चीनी तो गीली नहीं रहती
    लेकिन
    गीली रहती है
    माँ की आँखें ... !

    बहुत ही संवेद्य पंक्तियाँ ! किसी की भी आँखें गीली कर दें.... !! मेरी तो हो ही गयी.... क्योंकि मैं ने शब्दशः इन दिनों को जीया है !!!! बहुत-बहुत धन्यवाद !!!!

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  11. वर्षों बाद अब
    चीनी तो गीली नहीं रहती
    लेकिन
    गीली रहती है
    माँ की आँखें ... !
    जबरदस्त संवेदनशील

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  12. शुक्रिया छोटा शब्द है...गीलापन मुबारक.

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  13. बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

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  14. ARUN JI
    कैसे लिख जाते हो यार ऐसा सब..........

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  15. बहुत संवेदनशील रचना....
    मेरे भैया .....रानीविशाल
    रक्षाबंधन की ढेरों शुभकामनाए !!

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  16. मां की ममता को दर्शाती आपकी यह कविता किसी की प्रशंसा,आलोचना एवं छिद्रान्वेषण की मुहताज नही है। आगे बढते रहे-मां सरस्वती की कृपा बनी रहे।

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  17. वर्षों बाद अब
    चीनी तो गीली नहीं रहती
    लेकिन
    गीली रहती है
    माँ की आँखें ...

    संवेदनशील ... सीधे दिल में उतार जाती है ये रचना ...

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  18. geeli cheeni ! aankhen geeli kar gai..! is cheeni ke bheegepan me maa ka ahasaas..! ohh ! aisee rachnayen bhee likhte hian sh. arun ji ! jo is cheeni ke mithas ko maathas ko maan kee aankhon se swayam kee aankhen nam kar jaaye...! itna hee kahunga ki..bar-bar padhi...har shab me...mujhe meri maa kee hee aankhen..mujhe apne nam aankhon se nihaarti dikhi..! bas..apalak padhta gay..padhta gay..badi himmat se ye tippani kee hai...sahme-sahme...kyonki aise mamatv ko bhavon kee pratikriya shabdon me dena...asambhav hai..! sadhuwad !

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  19. अमिताभ बच्‍चन की चीनी कम को गीली चीनी से बहुत जोरदार भावों और अहसासों में व्‍यक्‍त कर सफलतापूर्वक रिप्‍लेस कियाहै अरूण भाई ने।

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  20. cheeni geeli... is kavita ke antim kuch panktiyon ney aankhon ko gila kar diya..... meri maan jisney voh sab kiya jo aapki kavita kehti hai... parantu aaj (4 bete hotey hue bhi) voh akeli hai..... geeli cheeni ka alag anand tha.... aaj cheeni to gili nahi hai... aankheyn prayeh...geeli hoti hain....

    shat shat naman arun ji....is kavita key liyey....

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  21. मन ऐसे आलोड़ित हो गया है कि समस्त शब्द रुद्ध कुंठित हो गए हैं...क्या कहूँ...

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