सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

व्याकरण के बिना

ज्ञान नहीं
अक्षर का
पता नहीं
कैसे बनते हैं शब्द
अक्षरों से
कैसे शब्द मिलकर
बनाते है
वाक्य
और
वाक्य में क्या है
व्याकरण के सूत्र
नहीं पता मुझे

कहो ना
कैसे करे वह
प्रेम निवेदन
कैसे कहे अपने
ह्रदय की बात
कैसे जताए
अपनी प्रतिबद्धता...
कैसे बताये कि
आँखे बस देखती हैं तुम्हे
साँसों में बस बसी हो तुम
मन पर बस साम्राज्य है
तुम्हारा

कहो ना
कैसे लिखें
प्रेम का काव्य
बिना व्याकरण
बिना सूत्र

14 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ अहसास, कुछ अभिव्यक्ति, ... बस पहुंच जाती हैं लक्ष्य तक, उसे शब्द की ज़रूरत नहीं पड़ती। जाने क्या तूने कही....

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    योगदान!, सत्येन्द्र झा की लघुकथा, “मनोज” पर, पढिए!

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  2. शब्द तुम्ही हो, शब्दों का विन्यास तुम्हीं,
    अर्थ भरेगा उनमें, यह विश्वास तुम्हीं।

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  3. प्रेम में कोई व्याकरण नहीं होता ...और शायद न शब्द होते हैं न अक्षर ...फिर वाक्य की क्या ज़रूरत ?

    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  4. कहो ना
    कैसे लिखें
    प्रेम का काव्य
    बिना व्याकरण
    बिना सूत्र
    pyaar to aankhon ki bhasha hai, vyakaran ki kya zarurat

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  5. प्रेम का काव्य लिखने के लिये किसी व्याकरण या सूत्र की जरूरत नही होती सिर्फ़ दिल होना चाहिये और दिल मे उमडते ज्वार होने चाहिये …………काव्य ही नही महाकाव्य लिख दिया जाता है…………………प्रेम कभी किसी का मोहताज़ नही होता अगर होता है तो सिर्फ़ प्रेम के स्वीकारने का……………………बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  6. pyar ke liye na vyakaran chahiye na hi shabd/bhasha. ye to bas ek ehsas ,ek ANUBHUTI hai.achchi kawita.mera sadhuwad...

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  7. रचना तो बहुत बढ़िया है!
    --
    दिल से दिल को राहत होती है!

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  8. कैसे बताये कि
    आँखे बस देखती हैं तुम्हे
    साँसों में बस बसी हो तुम
    मन पर बस साम्राज्य है
    तुम्हारा ......

    मौन प्रेम की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....बहुत सुन्दर...आभार..

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  9. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति......प्रेम के लिये तो सिर्फ दिल की भावना ही काफी है

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  10. कभी चुप्पी का व्याकरण पढ़ा है आपने! नहीं न.. मौन का कोई व्याकरण नहीं होता, न शब्द के अर्थ, न वाक्य का विन्यास, न छंदों की रचना… बरसों से प्रणय की यही भाषा रही है और यही व्याकरण…
    चुप तुम रहो, चुप हम रहें
    ख़ामुशी को ख़ामुशी से
    बात करने दो!
    या फिर,
    प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं
    एक ख़ामोशी है, सुनती है कहा करती है!
    दुबारा सोचिये, व्याकरण की आवश्यकता है क्या???

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