रविवार, 3 अक्तूबर 2010

प्रेम में कुछ अलग नहीं होता

प्रेम में
नहीं उगता सूरज
पश्चिम से
न ही
अस्त होता है
पूरब में

बादलो का रंग
पीला नहीं हो जाता
न ही
हरा हो जाता है
गुलाब
प्रेम में


प्रेम में
मानसून नहीं आता
समय से पहले
न ही
वसंत आता है
ग्रीष्म में


पृथ्वी
नहीं बदल देती
परिक्रमा का रास्ता
न ही
कम या अधिक होती है
गति इसकी
प्रेम में


समंदर का पानी
नहीं हो जाता मीठा
न ही लहरे
लौटना छोड़ देती हैं
छू कर तटों को
प्रेम में


प्रेम में
नहीं बदलता
जरूरतें घर की
न ही कम हो जाती है
माँ की दवा


प्रेम में
कुछ नहीं होता
बस

पाने से अधिक
भय रहता है
खोने का

जैसे होता है
आम जीवन में

16 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर परिभाषित किया है प्रेम को

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  2. प्रेम में
    कुछ नहीं होता
    बस
    पाने से अधिक
    भय रहता है
    खोने का
    --
    बिल्कुल सही विश्लेषण!

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  3. आदरणीय अरुण चन्द्र रॉय जी
    नमस्कार !
    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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  4. प्रेम की गति प्रकृति से बँधी ही नहीं। पता नहीं कौन चलाता है इसको।

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  5. पाने से अधिक
    भय रहता है
    खोने का
    जैसे होता है
    आम जीवन में

    सटीक कहा है ...सुन्दर रचना

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  6. अरुण जी... एक लम्बा अनुभव है प्रेम का. और शायद उस अनुभव के आधार पर दावे के साथ कह सकता हूँ कि प्रेम में वो सब होता है, या मेरे साथ हुआ, जो आपने कहा कि नहीं होता है. सागर मीठा लगता है और आकाश पीला, गुलाब हरा और ग्रीष्म शीतलता प्रदान करता है. जाड़ों में बदन जलता है और बसंत भी सूखा दिखता है. सब कुछ पा लिया जैसा लगता है और खो देने का डर जैसा आपने बताया सबसे अधिक होता है. जो पा लेता है वो कुछ और बन जाता है, जो खो बैठता है वो सलिल वर्मा बन जाता है. बेहतरीन प्रस्तुति!!

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  7. असहमति रहते हुए यह कहता हूं कि कविता अच्छी लगी।

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  8. प्रेम मे क्या क्या होता है उसका तो पता नही वैसा प्रेम कभी किया नही……………मगर फिर भी एक बात तो बिल्कुल सही है कि खो देने का डर सबसे बडा होता है और उसके लिये तो खास जिसने प्रेम पा लिया हो।

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  9. bahut hi achhi nazm hai ..khair maine to jo kuch bhi kaha hai prem par usme yahi kaha hai ki mansoon kisi ke ishare par ..badal alag alag rangon ke hain ...aur indradhnush teer bhi chalane lagta hai ...heheheh...aapne to meri kavitaon ka dil hi to diya ...lekin han baat to aapne saau taka sahi kahi ...anand aaya yah rachna padh kar

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  10. ये सब कुछ तो होता है प्रेम में ... पर देखने का नज़रिया बदल जाता है .... लाजवाब रचना है ....

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  11. बहुत सही व्याख्या की आपने प्रेम की ...... पाने से अधिक खोने का भय !!!!!

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  12. हम भी सलिल जी के साथ हैं। पूरी कविता में आपने केवल अंत वाली बात ही सही कही है। मुश्किल यही है कि लोग खो देने के डर से ही बाकी चीजें महसूस नहीं कर पाते। और सच तो यह है बंधु प्रेम में सिवाय प्रेम के कुछ नहीं होता,इ‍सलिए आपको कुछ और दिखाई ही नहीं देता।

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  13. अरूण जी,

    एक सूत्र के सहारे यहाँ तक पहुँच पाया हूँ, प्रेम की भावनाओं में डूब गया, आता रहूंगा यहाँ पर।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  14. ALAM KHURSHEED JI NE EMAIL KE JARIYE KAHA:
    प्रिय अरुण जी !
    प्रेम!
    अभी अभी दफ़्तर् मे ज़रा देर के लिये मौक़ा मिला तो आप की कविता खोली ।
    धन्य्वाद् क्योकि कविता बहुत सुन्दर है और आप ने कलात्मक अन्दाज़् मे बुनी है ।
    कविता का अन्त लाजवाब् है और मन को मोह लेता है ।
    मेरी ओर से इस सुन्दर कविता के लिये धेर सारी मुबारकबाद !
    आलम खुरशीद

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  15. वाह!! बड़ा लम्बा और गहरा प्रेम का अनुभव रहा आपका.लगता है सब कुछ कर के देख लिया फिर निष्कर्ष पर पहुंचे हैं.यकीन मानें अनुभव और निष्कर्ष दोनों ही खरे हैं

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