सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

पानी लगे पैर

बचपन से 
अब तक
सुनता आ रहा हूँ
पैरों में 

पानी लगने के बारे में 
सोचता भी आया
लेकिन कहाँ समझ पाया 
मैं भी

औरतें
जो करती हैं 

घरों/ खेतों में काम
उनके पैरों में
लगा होता है पानी 
फैक्ट्री और दफ्तरों में 
काम करने वाली औरतें भी 
अछूती नहीं रहतीं

घुटने भर पानी लगे खेतों में  
जो हरवाहे बनाते हैं  हाल
जो मजूर बोते हैं धान
उनके पैरों में भी लगा होता  है  पानी 
एक्सपोर्ट हाउस/एम् एन सी  के कामगार 
अपने सपनों के साथ 
पैरों में लगाये होते हैं
अलग  तरह  का पानी 


जो पैर
लक्ष्मी होते हैं
पूजे जाते हैं
उन पैरों में भी
लगा होता है पानी
बुरी तरह से
आज भी .

आँगन से घर 
घर से दालान 
दालान से खेतों तक 
चकरघिन्नी खाती माँ के पैरों में भी
 लगा होता था पानी
और लगा रहा वह
उमर भर
नहीं  समझा गया 
उसे या  
उसके पानी लगे पैरों को 
अलग बात है कि 
उसके नहीं रहने के बाद सूना हो गया था 
घर आँगन 
अनाथ हो गए थे 
खेत खलिहान, बैल-गोरु

जबकि
फटे हुए
विवाई भरे पैर
दिख भी जाते हैं
नहीं दिखता
पैरों में लगा हुआ पानी 
चुपचाप लिपटा रहता है पानी 
पैरों से किसी जोंक की तरह

आँखों के पानी की तरह
सुख-दुःख में
छलक नहीं उठता 
पैरों में लगा पानी.

16 टिप्‍पणियां:

  1. आँखों की पानी की तरह
    सुख-दुःख में
    छलक नहीं उठता
    पैरों में लगा पानी

    कविता के माध्यम से बहुत बड़ी बात कह दी आपने....

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  2. एक अनकहे दर्द को बयाँ करती रचना ………………निशब्द कर दिया।

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  3. पैरों में लगा पानी और पानी लगे पाँव, पहचान हैं एक कर्मवीर के, एक कर्मयोद्धा के... वह कर्मवीर जो डोली में बैठकर आता है एक चारदीवारी के अंदर और अर्थी पर ही निकलता है उस चारदीवारी की क़ैद से. वीरों और विजेताओं के सिर पर सजते मुकुट तो सबने देखे, किंतु पैरों में सजा काँटों की तरह चुभता ईनाम, आपको दिखा.. अरुण जी, साधुवाद!

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  4. बहुत सुन्दर रचना!
    --
    मंगलवार के चर्चा मंच पर इसे चर्चा में लिया गया है!
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. umda rachna with amazing thought process, your incredible unique thought process me amaze me every time...

    Jahan na pahuche ravi wahan pahuche kavi...

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  6. आँखों की पानी
    इस पर एक बार ध्यान देंगे।
    कविता अच्छी लगी।
    प्रतीक के सहारे एक गंभीर बात कहने का प्रयत्न स्पष्ट है।

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  7. पैरों में लगा पानी कितनी बातें कह जाता है।

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  8. paani par itanaa vistaar se sochaa jaa sakataa hai.aaj jaanaa. bahut achhee lagee rachanaa.

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  9. Manik jee ne sach kaha, Pani lagne par bhi itna likha ja sakta hai, socha na tha.......sach me Arun jee, kahan kahan se Bimb late ho.....aap sach me mere liye anukarniya ho!!

    kitne pyare dhang se aapne pani lagne ke dard ko bayan kiya hai, wo bhi sidhe saadhe sabdo me....

    nih-shabd kar diya aapne........

    फटे हुए
    विवाई भरे पैर
    दिख भी जाते हैं
    नहीं दिखता
    पैरों में लगा हुआ पानी
    चुपचाप लिपटा रहता है पानी
    पैरों से किसी जोंक की तरह

    thanx Arun jee!!

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  10. आँखों के पानी की तरह
    सुख-दुःख में
    छलक नहीं उठता
    पैरों में लगा पानी ...

    सच कहा ... ये पैरों में लगा पानी ही होता है जो आँखों के पानी को डोर रखता है ... छलकने नही देता ....

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  11. आँखों के पानी की तरह
    सुख-दुःख में
    छलक नहीं उठता
    पैरों में लगा पानी ..

    बहुत भावुक रचना ।

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  12. waah..ashqon ka dard to sab samjhte thai..par is paani ke dard tak to aaj pahunche hain..unique!

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  13. bahut gehre dard ka bahhv liye hai rachna ... dhanyawaad rachna ko hum tak pahunchane ke liye ...

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  14. आँखों के पानी की तरह
    सुख-दुःख में
    छलक नहीं उठता
    पैरों में लगा पानी.
    बहुत खूबसूरती से भाव पिरोया है और फिर बिम्ब के तो क्या कहने

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  15. ओह...मर्मस्पर्शी !!!

    भावपूर्ण बहुत ही सुन्दर रचना,मन भिंगो गयी...

    आभार !!!

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