सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

ए़क खुला प्रेम पत्र

वर्षों से 
पड़ा है  
किताबों के बीच  
ए़क पोस्टकार्ड 
लिखी है  
उसपर ए़क कविता 
शीर्षक है 
"ए़क खुला प्रेम पत्र" 

वर्ष बीते 
किताबें बदली  
बदले विषय  
बदला समय  
बदला स्थान 
लेकिन नहीं बदला  
वह पोस्टकार्ड  
उसपर लिखी कविता भी   

छुपाया करता था 
पोस्टकार्ड को 
माँ से  
बाबूजी से 
बहन से 
दोस्तों से  
और तुम से भी  
आज खुले में पड़ा रहता है
पोस्टकार्ड
कोई देखता नहीं इसे

समय के साथ
पोस्टकार्ड का रंग
हो गया है
थोडा मटमैला
अक्षर भी हो रहे हैं
धुंधले से
फिर भी
नया सा लगता है
पोस्टकार्ड और 
ताज़ी है
स्मृतियों में वह कविता
शब्द शब्द
अक्षर अक्षर

तैयार है
पोस्टकार्ड अब भी
बस बाकी है
पता लिखा जाना
कहना तो जरा -
कहाँ  हो
इन दिनों .

27 टिप्‍पणियां:

  1. यह दाम्‍पत्‍य प्रेम को मज़बूती देने वाली कविता है। तभी तो
    आज खुले में पड़ा रहता है
    पोस्टकार्ड

    जिसे न भेजा सका, "ए़क खुला प्रेम पत्र", भी भिंगोने वाला है भिंगोने की आशय रूलाने-धुलाने से नहीं बल्कि आत्‍मा को प्रकाशित करने से है। प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए हिंदी में बहुत प्रेम कविताएं है "ए़क खुला प्रेम पत्र" जैसी सच्‍ची प्रेम कविता वही पुरूष लिख सकता है जिसकी आत्‍मा ने अपनी काया बदल ली हो। इसे पढ़ते हुए यदि कोई राग से भर उठे तो आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए।

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  2. आज आपने न जाने कितने पोस्‍टकार्ड, न जाने कितनों के सामने खोल दिये। बेहतरीन कविता।

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  3. बहुत खूब ..
    पोस्टकार्ड पर तभी पता लिख देते
    शायद अब पता नही कि पता क्या है ......

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  4. छुपाया करता था
    पोस्टकार्ड को
    माँ से
    बाबूजी से
    बहन से
    दोस्तों से
    और तुम से भी
    आज खुले में पड़ा रहता है
    पोस्टकार्ड
    कोई देखता नहीं इसे
    ......
    तैयार है
    पोस्टकार्ड अब भी
    बस बाकी है
    पता लिखा जाना
    कहना तो जरा -
    कहाँ हो
    इन दिनों .
    ............. yah prashn bhi bemani ho jaye usse pahle postcard ko poora kar dena hai , wah samay saath ho usse behtar kuch bhi nahi

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  5. पोस्टकार्ड एक सुन्दर कविता ही नहीं पूरा आख्यान है .बधाई .

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  6. दिल में उतर गई रचना...काश! अब भी कहे वो अपना पता...शब्द शब्द चमक उठेंगे.


    सुन्दर!!

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  7. मैं क्या बोलूँ अब....अपने निःशब्द कर दिया है..... बहुत ही सुंदर कविता.

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  8. तैयार है
    पोस्टकार्ड अब भी
    बस बाकी है
    पता लिखा जाना
    कहना तो जरा -
    कहाँ हो
    इन दिनों .pata to mil bhi jayega us khule prempatra ko bhejane ke liye,par kya ab bhi bhej payenge use,kai prashan ,kai ashankaye abhi bhi hai ,thoda sa apana roop badal kar.....

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  9. अरुण जी,
    संग्रहणीय हैं वे पत्र, जो अपने पते पर नहीं पहुँचे... और आपने तो उस पोस्टकार्ड को बुकमार्क बना लिया है, यादों की किताब का इस खुले प्रेम पत्र से बेहतर बुकमार्क कोई हो ही नहीं सकता..
    बहुत सुंदर!!

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  10. बहुत ही सुन्दर। पता लिखा जाना ही बाकी था, दिल की बात लिये ते हम कब से बैठे हैं।

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  11. उफ़ आखिरी पंक्ति ने तो झंझोड कर रख दिया जैसे..दिल का सारा दर्द सिमट कर आ गया.
    बेहतरीन रचना.

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  12. सुंदर कविता के लिए बधाई। वाह निकलते निकलते रह गया। हल्‍के से संपादन के बाद कविता अपनी पूर्णता पर पहुंच जाती है। जैसे पता लिखा जाना नहीं पता लिखना। अंतर यह है कि लिखे जाने में भाव आता है कि कोई और लिखने वाला है,जबकि लिखना में यह गुजांइश ही नहीं बचती। याकि कहना नहीं बताना। कहने में यह भाव आता है कि वह आसपास ही है,दूरी प्रकट नहीं होती। जबकि बताने में यह भाव आता है कि खो गई है। ऐसी कुछ और बातें हैं।

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  13. तैयार है
    पोस्टकार्ड अब भी
    बस बाकी है
    पता लिखा जाना
    कहना तो जरा -
    कहाँ हो
    इन दिनों .

    वो तो अन्तस मे ही है तभी तो पता मिलकर भी नही मिल रहा ……………जहाँ दूरी हो तो ढूँढना भी पडे……………खुले प्रेम पत्र मे तो सब खोल ही दिया है आपने तो अब बचा क्या? बेहद खूबसूरत प्रेम पत्र है और शायद हर इंसान ऐसा प्रेम पत्र एक बार जरूर लिखना चाहेगा।

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  14. और तुम से भी
    आज खुले में पड़ा रहता है
    पोस्टकार्ड
    कोई देखता नहीं इसे

    तब नहीं छिपाया होता तो आज यह पोस्टकार्ड याद नहीं रहता ...खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  15. दिल को छू लिया ...शायद पोस्टकार्ड पर पता न लिख पाना यह उस समय की सामाजिक मर्यादाओं को दर्शाता है जिसके कारण बाद में ज़िन्दगी भर उस पोस्टकार्ड पर पता न लिख पाने का अफ़सोस रहता है...बहुत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति..

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  16. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  17. शीर्षक से ही भावनाओं की गहराई का एह्सास होता है।

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  18. अरुण जी,
    खुले प्रेम-पत्र के माध्यम से मुझे अपने अतीत का वातायन खोलकर वहां पड़े कुछ "न भेजे गए पत्र" को पढ़ने पर मजबूर कर दिया.आज वे ख़त तो नहीं हैं,मगर उसका अक्षर-अक्षर,शब्द-शब्द याद है.समय ने हमें तो बदल दिया पर उन यादों को मिटा नहीं पाया. कल्पना की बेहतरीन उडान का लिए बधाई.

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