सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

पहाड़ बदलना चाहते हैं



पहाड़ों को
सदा ही रहा है
भ्रम
आकाश को छूने  का
नदियों के लौट जाने  का
इसलिए रह गए हैं
पहाड़ 

निर्जल
अकेले . 





पहाड़ो को
सदा ही रहा है
दर्प
अपनी ऊंचाई का
इसलिए रह गए हैं
पहाड़ 

छोटे
अकेले

 

पहाड़ों को
सदा ही रहा है
अभिमान
अपने दुर्गम्य होने का
इसलिए रह गए हैं
पहाड़
निर्जन
अकेले.
 

पहाड़
तंग आ चुके हैं
अपने अकेलेपन से
और
बन जाना चाहते हैं
पानी
हवा
सुगंध
फूल

22 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर और शानदार प्रेरक कविता...

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  2. पाँचों शब्द-चित्र देख लिए..
    --
    पहाड़ पर आपकी अभिव्यक्ति बहुत खूबसूरत हैं!

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  3. shi khaa jnaab yeh klyug he yhaan hr phad ko insaan ne jit liyaa he isliyen ab phadon ko khud ko hi bdlna hogaa . akhtar khan akela kota rajsthan

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  4. 5.5/10


    बहुत सुन्दर पोस्ट
    पहला और आखिरी पार्ट मिलकर ही कविता मुकम्मल हो जाती है.
    ख़ास तौर पर तीसरा पार्ट अनावश्यक विस्तार है.

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  5. बहुत सुन्दर बातें मन को छू गयीं.या यो कहें की अब तो पहाड़ भी समझने लगे हैं अब तो समझ जाओ संभल जाओ

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  6. अच्छे चित्र खीचें हैं आपने..पहाड़ों के.

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  7. सुन्दर शब्दचित्र और भाव ..

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  8. पहाड़
    तंग आ चुके हैं
    अपने अकेलेपन से
    और
    बन जाना चाहते हैं
    पानी
    हवा
    सुगंध
    फूल
    Bahut sundar !

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  9. बहुत सुन्दर शब्दचित्र ..प्रेरक भाव..बधाई.

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  10. पहाड़
    तंग आ चुके हैं
    अपने अकेलेपन से
    और
    बन जाना चाहते हैं
    पानी
    हवा
    सुगंध
    फूल

    हाँ ठहरी हुई जिंदगी किसे भाती है.... बहुत सुंदर

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  11. अभिमान और दर्प एक तरफ और बड़प्पन दूसरी तरफ.. एक बहुत पहले पढ़ा शेर याद आ रहा हैः
    बुलंदी कब तलक इक शख्स के कब्ज़े में रहती है,
    बड़ी ऊँची इमारत हर समय ख़तरे में रहती है.
    शायद कई लोग आपकी इस कविता से सीख ले सकें!!

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  12. इतनी सुन्दर कविता पहले नहीं पढ़ी, इस विषय पर।

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  13. पहाड़ को गर्व है अपने अडिग अटल अस्तित्व का , वह मौन द्रष्टा है प्रकृति के परिवर्तित रूपों का ,खुद भी विलीन होता है ,
    गौर से देखो उसके अन्दर वह सब है, जो बाहर से दिखता नहीं

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  14. अहंकार , अहम् , अकेलेपन से तंग आ चुके हैं पहाड़ ...
    और बन जाना चाहते हैं पानी , हवा , फूल , सुगंध ....
    अच्छी कल्पना ...!

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  15. पहाड़
    तंग आ चुके हैं
    अपने अकेलेपन से
    और
    बन जाना चाहते हैं
    पानी
    हवा
    सुगंध
    फूल

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  16. पहाडों के माध्यम से आपने जीवन दर्शन करा दिया है……………जो भी इनसान अभिमान के दर्प मे रहता है वो चाहे कितनी ही ऊँचाई पर पहुँच जाये कहीं ना कहीं जाकर अकेला पड ही जाता है और फिर एक वक्त आता है जब उसे भी फिर उन ही गलियों मे आना पडता है जिन्हे वो हेय समझता है……………मानव जीवन की बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  17. काश् आपके माध्‍यम से व्‍यक्‍त पहाड़ों की इच्‍छा पूर्ण हो सके।
    पहाड़ों ने यूँ तो सताया हमें,
    अकेले हुए तो बुलाया हमें।
    पहाड़ों का अस्तित्‍व कुछ भी नहीं
    अगर छोड़ सब जायें उसकी ज़मीं।

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  18. बहुत खूब ... पहाड़ों में भी जैसे आत्मा का वास कर दिया है आपकी लेखनी में ... ज़ज्बात भर दिए हैं ...

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