रविवार, 31 अक्तूबर 2010

फूल हूँ मैं

फूल को
देखा है कभी
लगते हैं
कितने प्रिय
कितने मोहक
और
अपनी सुगंध से
सुवासित कर देते हैं
परिवेश

खुशबू 
पसर  जाती  है 
वातावरण में 
मनोहारी हो जाते हैं दृश्य 
मन महक जाता है 
फूलों का 
पा कर सानिध्य

लेकिन प्रायः
महसूस नहीं किया होगा
डाली से टूटने का
उसका दर्द
उसके पंखुडियो के
असमय बिखर जाने की वेदना से
परिचित नहीं होगी तुम

फूल है
मेरा प्रेम
जिसे भय है
तुमसे विस्थापन का,
तुम्हारी डाली से 
विच्छेदन का
असमय 
कुम्भला जाने का

फूल हूँ मैं
इसमें क्या कर सकती हो
तुम भी

17 टिप्‍पणियां:

  1. फूल का काम ही है खूश्बू लुटाना।

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  2. अरुण जी.. आपकी कविता तो हमेशा ही उत्तम होती है... इस कविता में भी आपने फूल के वातावरण को सुवासित करने के गुण के साथ डाली से बिछने का उसका दर्द भी उकेरा है.
    किंतु एक संशय मेरे मन में उठ रहा है... कविता का शीर्षक है "फूल हूँ मैं"... किंतु पूरी कविता में फूल को अन्य पुरुष के रूप में सम्बोधित किया गया है… ऐसा प्रतीत होता जैसे कवि फूल की व्यथा का वर्णन कर रहा है न कि फूल स्वयम्...

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  3. फूलों की व्यथा को उकेरती एक प्रभावशाली कविता।

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  4. फूल को फूल ही रहनें दें
    उसूल बनाने की भूल न करें

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  5. 5.5/10

    सुन्दर कविता / सार्थक लेखन
    अपनी उपयोगिता की खातिर जड़ से कटना भी पड़ता है.
    कविता में कई द्वन्द उभरते हैं.

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  6. फूल है
    मेरा प्रेम
    जिसे भय है
    तुमसे विस्थापन का,
    तुम्हारी डाली से
    विच्छेदन का
    असमय
    कुम्भला जाने का

    prabhaw chhodti rachna

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  7. फूल की सुगंध का फैलना और फिर डाल से विस्थापित होने का दर्द ... बहुत सहजता से उकेरा है

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  8. भावनायें फूल सी सुकुमार होती हैं, सहेज कर रखें सब।

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  9. कुछ भी कहने लायक नही छोडा……………क्या खूब कहा है ………………निशब्द कर दिया।

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  10. फूल है

    मेरा प्रेम

    जिसे भय है

    तुमसे विस्थापन का,

    तुम्हारी डाली से

    विच्छेदन का

    असमय

    कुम्भला जाने का


    फूल हूँ मैं
    इसमें क्या कर सकती हो
    तुम भी

    फूल के माध्यम से एक प्रेमी के दिल का जो वर्णन किया है उसका जवाब नही और यही आपके लेखन की खूबसूरती है।

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  11. फूल है

    मेरा प्रेम

    जिसे भय है

    तुमसे विस्थापन का,

    तुम्हारी डाली से

    विच्छेदन का

    असमय

    कुम्भला जाने का

    बहुत ही सुन्‍दर एवं भावमय प्रस्‍तुति ।

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  12. खुशबू
    पसर जाती है
    वातावरण में
    मनोहारी हो जाते हैं दृश्य
    मन महक जाता है
    फूलों का
    पा कर सानिध्य........
    sunder kavita.......

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  13. फूल है
    मेरा प्रेम
    जिसे भय है
    तुमसे विस्थापन का,
    तुम्हारी डाली से
    विच्छेदन का
    असमय
    कुम्भला जाने का
    dar ki behtareen prastuti....

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