गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

प्रकाश के भीतर का अन्धकार

प्रकाश के
भीतर के अन्धकार को
देखो जरा
कितना घुप्प है
कितना विस्मृत कर देता है,
कर देता है
समय से दूर
बहुत भयावह होता है
प्रकाश के भीतर का अन्धकार


यह अन्धकार
सबसे पहले हमला करता है
ह्रदय पर
और बना देता है एक शून्य
चेतना के पटल पर
जो काम करता है
ब्लैक होल की तरह
और अपने भीतर खींच ले जाता है
समस्त ऊर्जा
समस्त सृजन

संभावनाएं सभी
नष्ट हो जाती हैं
पौधों की हरीतिमा
घुटने लगती है
और अमरबेल करती  है
अट्टहास 
प्रकाश के अन्धकार के बीच

दीपक तले
जो बसता है अँधेरा
वह बहुत भिन्न होता है
प्रकाश के भीतर के अन्धकार से
एक में समर्पण होता है दीपक का
दूजे में होता है अहं प्रकाश पुंज का
अब भी छंटता है अंधेरा
एक दीपक से .

26 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत भयावह होता है
    प्रकाश के भीतर का अन्धकार


    कितना सत्य है...बिल्कुल उसी अंधकार की मानिंद!!

    बहुत सुन्दर रचना..गहरे भाव लिए.

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  2. अब भी छंटता है अंधेरा
    एक दीपक से
    और शायद इसी छटपटाहट का नाम ही तो जीजिविषा है..
    यह छटपटाहट बरकरार रहे
    सुन्दर रचना ... बेजोड़

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  3. यह अन्धकार
    सबसे पहले हमला करता है
    ह्रदय पर
    और बना देता है एक शून्य
    चेतना के पटल पर
    जो काम करता है
    ब्लैक होल की तरह
    बहुत खूब...बिलकुल नायाब रचना है..नए भावों के साथ

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  4. यह अन्धकार
    सबसे पहले हमला करता है
    ह्रदय पर
    और बना देता है एक शून्य
    चेतना के पटल पर
    जो काम करता है
    ब्लैक होल की तरह
    बिलकुल सही कहा। अच्छी लगी रचना। बधाई।

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  5. 7.5/10

    प्रभावशाली कविता
    आपकी गहरी सोच चमत्कृत करती है.
    बरखुदार आपका लेखन-स्तर उचाईयों पर जा रहा है.

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  6. प्रकाश के बीच ब्लैक होल .... बहुत अच्छा बिम्ब लिया है ...अच्छी रचना ...

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  7. एक में समर्पण होता है दीपक का
    दूजे में होता है अहं प्रकाश पुंज का bahut khoob......

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  8. अरुण भाई माफ करें। बात कुछ गहरी है कि दो बार पढ़ने के बाद भी समझ नहीं आई।

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  9. सदा नम्रता की पोशाक पहने रहिए, इससे दूसरों का प्रेम व सहयोग स्‍वत: ही मिलेगा। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    विचार-नाकमयाबी

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  10. बहुत ही बेहतरीन रचना,,...काफी सारा अर्थ छुपा है इसमें, बार बार पढने योग्य..शुभकामनाएं.

    उदास हैं हम....

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  11. कविता को पढ़ते पढ़ते कुछ देर ठहर कर सोचना पढ़ता है कितना गहरा अर्थ छुपा है इस कविता मैं.

    --
    सादर,

    माणिक;संस्कृतिकर्मी
    17,शिवलोक कालोनी,संगम मार्ग, चितौडगढ़ (राजस्थान)-

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  12. Dr. Divya Srivastav said through email:

    यह अन्धकार
    सबसे पहले हमला करता है
    ह्रदय पर
    और बना देता है एक शून्य
    चेतना के पटल पर ...

    ------

    बहुत सुन्दर तरीके से अभिव्यक्त किया है आपने अन्धकार को। बहुत बार महसूस किया है अन्धकार को इसी तरह ह्रदय और मस्तिष्क पर आक्रमण करते। इस सुन्दर रचना के लिए आपको बधाई।

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  13. यह अन्धकार
    सबसे पहले हमला करता है
    ह्रदय पर
    और बना देता है एक शून्य
    चेतना के पटल पर
    जो काम करता है
    ब्लैक होल की तरह
    और अपने भीतर खींच ले जाता है
    समस्त ऊर्जा
    समस्त सृजन
    aur poora vajood khaali ho jata hai, vismriti ki had tak vyakti khamosh ho jata hai

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  14. Navin Dewangan
    to Arun Roy
    date Fri, Oct 29, 2010 at 8:56 AM
    subject Re: मेरी नई कविता पढ़िए "प्रकाश के भीतर का अन्धकार" www.aruncroy.blogspot.com
    mailed-by gmail.com
    signed-by gmail.com
    hide details 8:56 AM (2 minutes ago)
    बहुत सुंदर

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  15. "दीपक तले
    जो बसता है अँधेरा
    वह बहुत भिन्न होता है
    प्रकाश के भीतर के अन्धकार से
    एक में समर्पण होता है दीपक का
    दूजे में होता है अहं प्रकाश पुंज का "--sundar !
    --Ashok Lav

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  16. यह अन्धकार
    सबसे पहले हमला करता है
    ह्रदय पर
    और बना देता है एक शून्य
    चेतना के पटल पर
    जो काम करता है
    ब्लैक होल की तरह
    और अपने भीतर खींच ले जाता है
    समस्त ऊर्जा
    समस्त सृजन

    par aapne apne samast urja ko sinchit kar rakha hai sir.......:)
    kitni bakhubi se aap apni baat kah paate ho!!
    badhai sweekaren.........

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  17. एक बेहद गहन अभिव्यक्ति……………ये अन्धकार ही तो सर्वत्र व्याप्त है हमारे अन्दर के आलोक मे सिमटा रहता है और उसे भेद नही पाता है…………मगर एक छोटी सी किरण ही सारे अन्धकार को मिटा देती है जब ये आभास हो जाता है कि "मै" कौन हूँ तब सारा अन्धकार मिट जाता है।

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  18. प्रकाश के
    भीतर के अन्धकार को
    देखो जरा
    कितना घुप्प है...
    sir bahut confused kar dene wali kavita hai... samajh nahi aayaa.. sorry

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  19. अंतस के प्रकास को उद्दीप्त करने वाली एक सम्पूर्ण रचना ! शास्त्रीय और लोकोपयोगी !!

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  20. hum me se har ek ke andar andhakar to maujood hai hi. bas use khojane ki jaroorat hoti. tabhi hum use bhed sakte hai.

    sundar prastuti.

    aabhar.

    harish gupta

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  21. Andar ki peedha ko shabd de diye hain aapne .. gahre bhaav hain ... is prakaash aur andhkaar ke dwand mein ...

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