बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

रुकना नदी की प्रकृति नहीं


प्रिये
बहुत दिनों बाद
कल रात मुझे आयी नींद

और नींद में देखा सपना


सपना भी अजीब था
सपने में देखी नदी
नदी पर देखा बाँध
देखा बहते पानी को ठहरा
नदी की प्रकृति के बिल्कुल विपरीत



मैं तो डर गया था
रुकी नदी को देख कर
सपने में देखा कई लोग
हँसते, हंस कर लोट-पोत होते
ठोकते एक दूसरे की पीठ
रुकी हुई नदी के तट पर जश्न मानते लोग 


सपने में देखा सांप
काला और मोटा सांप
रुकी नदी के तल में पलता यह सांप
हँसते हुए लोगों ने पाल रखा है यह सांप
मैं तो डर गया
मोटे और काले सांप को देख कर
 

प्रिये
मैं तोड़ रहा था यह बाँध
खोल रहा था नदी का प्रवाह
मारना चाहता था काले और मोटे सांप को
ताकि
नदी रुके नहीं
नदी बहे , नदी हँसे
नदी हँसे ए़क पूर्ण और उन्मुक्त हंसी

क्योंकि  रुकना नदी की प्रकृति नहीं

प्रिये
मैं अकेला था
तोड़ते बाँध
मारते काले और मोटे सांप को
नदी भी मौन थी
लगता है उसकी मौन स्वीकृति थी
प्रकृति के विपरीत

30 टिप्‍पणियां:

  1. मैं तो डर गया था
    रुकी नदी को देख कर
    सपने में देखा कई लोग
    हँसते, हंस कर लोट-पोत होते
    ठोकते एक दूसरे की पीठ
    रुकी हुई नदी के तट पर जश्न मानते लोग
    गम्भीर प्रकृति चिन्तन करती सार्थक कविता.

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  2. सुंदर भाव जगाती कविता।
    बहुत खूबसूरती से रचना के माध्यम से प्रेरणा दी है .
    सुन्दर प्रवाहमान रचना ! आपकी लेखनी भी निरंतर चलती रहे यही कामना है !

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  3. जीवन चलने का नाम है और चलते रहना ही प्रकृति है इंसान की मगर उसमे जो कुंठाओं कटुताओ के साँप इंसान ने पाल रखे हैं वो उसे हमेशा आगे बढने से रोकते हैं…………………लेकिन ये तो इंसानी फ़ितरत नही उसे तो हर बाँध तोड्ना होगा और कटुता वैमनस्य से ऊपर उठना होगा तभी उसका जीवन सार्थक होगा………………इंसानी जीवन को प्रकृति मे माध्यम से जिस प्रकार आपने उकेरा है वो काबिल-ए-तारीफ़ है………………बेहद सुन्दर बिम्ब प्रयोग्।

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  4. aapne shi likha he lekin hm thodaa asmnjs me isliyen hen kyonki hmne sukhi ndiyaan, or ruki hui ndiya bhi dekhi hen . akhtar khan akela kota rajsthan

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  5. मजबूरी को यही माना जा रहा है कि लगता है उसकी मौन स्वीकृति थी
    प्रकृति के विपरीत....


    -बहुत उम्दा रचना.

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  6. विसंगतियों एवं कृत्रिमता पर अच्छा व्यंग्य. प्रतीक और विम्बों से लग रहा है कि अज्ञेय का जमाना फिर लौट आया है ! सुन्दर कविता ! धन्यवाद !!

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  7. nadi ka ruka hua pravah ....uski vivashta ko kavi ne sundarta se kaha hai....
    apni prakriti ke anuroop hi nadi bahegi!!!
    shubhkamnayen!

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  8. अरुन बाबू! आज त न जाने केतना नदी का प्रवाह रुका हुआ है अऊर नदी का मौन स्वीकृति भी है ई रुकावट के लिए! चारों ओर हँसता है आदमी, उसपर जो बेकार कोसिस करता है ई बाँध को तोड़ने का. एक बार स्वर का सरिता बहाकर देखिए इस जगत में, न जाने कहाँ कहाँ से मोटा मोटा साँप आचार संहिता का दुहाई देने के लिए आ जाएगा अऊर बंद कर देगा स्वर सरिता को. दुष्यंत जी याद आ गए, आपका कविता सेः
    हर तरफ ऐतराज़ होता है,
    मैं अगर रोशनी में आता हूँ.

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  9. कविता को जुझारू व्यक्तित्व देख रहा हूँ, उत्कृष्ट।

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  10. कविता में बिल्कुल नए बिम्बों का प्रयोग किया है आपने...बधाई।

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  11. भाई हमारा तो काम ही बॉंध बनाना है, अब आप बॉंध में सेधमारी करें ये बात है तो परेशान करने वाली; लेकिन कविता है; न जाने किन शब्‍दों में क्‍या भाव छुपा हो, बह जाने देते हैं।

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  12. क़तरे में दरिया होता है
    दरिया भी प्यासा होता है
    मैं होता हूं वो होता है
    बाक़ी सब धोखा होता है

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  13. दरिया कब रुका है
    अपनी मनमर्जी बहा है
    बाँध बना भी दिया गर
    फिर और तेज़ी से बहा है .

    खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  14. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति .....धन्यवाद !

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  15. 4/10

    भाव अच्छे हैं किन्तु कविता नहीं है

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  16. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    साहित्यकार-6
    सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  17. वाह वाह ..हम तो इस अविरल प्रवाह पर बहते चले गए ...आनंदित होकर ..बहुत ही अनुपम पंक्तियां हैं

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  18. नदी भले ही रुक गई हो पर भावनाओं का अविरल प्रवाह तो जारी है

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  19. ताकि नदी रुके नहीं
    नदी बहे , नदी हँसे
    बेहतरीन सोच की रचना ...
    बाँध को तोड़ने से पहले काले नागों को काबू में करना होगा.

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  20. शानदार कविता और सार्थक सोच...बधाई.



    ________________
    'शब्द-सृजन की ओर' पर आज निराला जी की पुण्यतिथि पर स्मरण.

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  21. कुछ नहीं, बस शुभकामनाएं देने आया हूं।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
    शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोsस्तु ते॥
    महाअष्टमी के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

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