गुरुवार, 8 जुलाई 2010

स्ट्रिंगर हूँ हुजूर

स्ट्रिंगर हूँ हुजूर

देश के चप्पे चप्पे तक
पहुचने के लिए
खबरिया चैनलों के हाथों कठपुतली हैं हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर

जब
ए सी वाले हमारे राजधानी के पत्रकार
जाते हैं डर
जाने को जंगलों में
खदानों में
बीहड़ो में
हमारे बाइट्स बिकते हैं
मुफ्त या कौड़ियों में हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर

देश की गहरी समझ रखने वालो को
नहीं पता है
खोरठा , संथाली , नागपुरी जैसी
कोई भाषा भी होती है हुजूर
लोग नंगे पाँव
पच्चीस पच्चीस मील जाते हैं
नदी नाले जंगल पार करके
या बिना पानी बिजली भी
इस देश में रहती है
बड़ी आबादी
देश की सही तस्वीर तो
रहती है हमारे पास हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर

हुजूर
हमारे फ़ोन नहीं उठाये जाते हैं
दिल्ली में
लोग मीटिंग्स में होते हैं वहां
लेकिन जब
'किसनजी' की बाइट्स लेनी होती है
रेल की पटरी उड़ जाती है
नजदीकी शहर से २०० किलोमीटर दूर
किस्मत खुल जाती है हमारे मोबाइल की
और घनघनाते हैं हमारे भी फ़ोन हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर

हुजूर
जब छिनता है
हमारा कैमरा माफिया के द्वारा
उठा कर ले जाती है पुलिस
बेबुनियाद आरोप में
जब आर्थिक परेशानी में
झूल जाता हूँ मैं पंखे या पेड़ से
नहीं बनती कोई खबर हुजूर
स्ट्रिंगर हूँ हुजूर

11 टिप्‍पणियां:

  1. अरुन राँय !
    एक कविता जो मर्मान्तक पीड़ा और दुर्लभ उपलब्धियों की कथा है ।
    प्रशंसनीय ।

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  2. इस रचना में मार्मिक चित्रण प्रस्तुत कर दिया है...

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति, संवेदनशील विषय, मार्मिक चित्रण, हृदयविदारक दृश्य!!!!!!!

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  4. झूल जाता हूँ मैं पंखे या पेड़ से
    नहीं बनती कोई खबर हुजूर
    स्ट्रिंगर हूँ हुजूर ..

    very touching lines !

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  5. wrote:
    "स्ट्रिंगर हूँ हुजुर!" पढ़ी!
    आप ने स्ट्रिंगरों कि समस्या पर प्रकाश तो डाली है और उनकी संवेदनाओं को भी उकेरा है मगर मुझे लगता है कि इस कविता पर और काम करने कि आवश्यकता है.
    कविता की खूबसूरती और मुलायमियत इस में नहीं आ पाई है. शायद आप ने जल्दबाजी से काम लिया है.
    दूसरी बात यह कि कविता का पात्र या कविता सुनाने वाला व्यक्ति या एकवचन होगा या बहु वचन उसके मुताबिक ही क्रिया का इस्तेमाल करें. कहीं " हूँ" आया है तो कहीं " हैं "
    आशा है मेरी बात पर ग़ौर करेंगे और अन्यथा न लेंगे.
    आलम

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  6. जब आर्थिक परेशानी में
    झूल जाता हूँ मैं पंखे या पेड़ से
    नहीं बनती कोई खबर हुजूर
    स्ट्रिंगर हूँ हुजूर

    arun ji aapki her rachna samajh ke ek naye pahlu ko chhute huye gujerti hai...
    aur man ko kuch sochne ke liye chore jati hai
    bahut khoob

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