शनिवार, 24 जुलाई 2010

नेपथ्य से

यह जो
रंगमंच पर हो रहा है
लिखी गयी है
इसकी स्क्रिप्ट
कहीं और
किसी और उद्देश्य से

ये पात्र
जो संवाद कर रहे हैं
सब झूठे हैं
सब बनावटी हैं
सब मुखौटे हैं
होठ इनके जरुर हैं
लेकिन स्वर इनका नहीं
दया के पात्र हैं ये

यह जो उत्साह दिख रहा है
सब खुशफहमी है
भीतर के दवाब को
कम करने की कोशिश है यह
जो जितना उत्साहित दिखता है
उतना सफल पात्र है वह

इस बीच
कुछ ऐसे भी पात्र हैं
जिन्होंने मना कर दिया था
लगाने को मुखौटा
ईमानदार शब्दों का साथ नहीं छोड़ा
और हाशिये पर पहुंचा दिए गए हैं

नेपथ्य से
नियंत्रित होता है
यह रंगमंच
किन्तु
पटाक्षेप होता है
अंत में

14 टिप्‍पणियां:

  1. और जब अंत में परदा गिरता है तो अभिनय की जगह हकीकत से साक्षात्कार होता है और तब कोई स्क्रिप्ट भी नहीं होता

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  2. जिन्होंने मना कर दिए थे
    लगाने को मुखौटा

    रंगमंच को जीवनमंच से कितनी सरलता से सम्बद्ध कर दिया है।

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  3. इस बीच
    कुछ ऐसे भी पात्र हैं
    जिन्होंने मना कर दिया था
    लगाने को मुखौटा
    ईमानदार शब्दों का साथ नहीं छोड़ा
    और हाशिये पर पहुंचा दिए गए हैं

    बिलकुल सही.....अच्छी प्रस्तुति

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  4. BHAI ARUN JI ,
    MAIN AAPKKA BLOG NIYMIT DEKHTA HUN ! AAP BAHUT ACHHI KAVITAYEN LIKH RAHE HAIN | SAMKALEEN KAVITA ME AAP NISHCHAY HI MUKAAM BANAYENGE | MERI SHUBH KAMNAYEN SADAIV AAPKE SATH HAIN> AAP KI IS KAVITA KA YE ANSH MUJHE PRABHAVIT KAR GAYA-
    ये पात्र
    जो संवाद कर रहे हैं
    सब झूठे हैं
    सब बनावटी हैं
    सब मुखौटे हैं
    होठ इनके जरुर हैं
    लेकिन स्वर इनका नहीं
    दया के पात्र हैं ये
    IS ANSH KI YE PANKTIYAN BADAL JATI TO JYADA SUNDRTA AATI-
    नेपथ्य से
    नियंत्रित होता है
    यह रंगमंच
    किन्तु
    पटाक्षेप होता है
    अक्षपटल के समक्ष !

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  5. उफ़्……………।गज़ब का विश्लेषण्।
    कल (26/7/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  6. नेपथ्य से
    नियंत्रित होता है
    यह रंगमंच
    किन्तु
    पटाक्षेप होता है
    अंत में

    जीवन के इस रंगमंच के नेपथ्य में कौन है कोई नही जानता ... बहुत अच्छे रचना है ...

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  7. इस बीच
    कुछ ऐसे भी पात्र हैं
    जिन्होंने मना कर दिया था
    लगाने को मुखौटा
    ईमानदार शब्दों का साथ नहीं छोड़ा
    और हाशिये पर पहुंचा दिए गए हैं

    बहुत ही सशक्त रचना .....ज़िन्दगी की सच्चाई पेश करती .....

    हर चहरे ने पहन रखा है नकाब यहाँ
    नोटों की गटठियों खुलता है पर्दा यहाँ .....

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  8. जिन्होंने मना कर दिया था
    लगाने को मुखौटा
    ईमानदार शब्दों का साथ नहीं छोड़ा
    और हाशिये पर पहुंचा दिए गए हैं

    अच्छी प्रस्तुति. बहुत ही सशक्त रचना

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  9. गर गिरा दिया पर्दा पहले ही तो सारी असलियत सामने ....

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  10. कुछ ऐसे भी पात्र हैं
    जिन्होंने मना कर दिया था
    लगाने को मुखौटा
    ईमानदार शब्दों का साथ नहीं छोड़ा
    और हाशिये पर पहुंचा दिए गए हैं
    ..........
    वाह !

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