गुरुवार, 29 जुलाई 2010

हारा है पहाड़ का अहम

देखा है कभी
पर्वत को
कितना तनहा होता है
नदी के उदगम के बाद ।

देखा है कभी
नदी को
कितना उत्सव होता है
उसके तट पर
उसके रास्ते में
उसके बहाव में
सागर से मिलने की आस में ।

देखा है कभी
हिमालय को
उसका अहम
पिघलने नहीं देता उसे
नहीं बनने देता नदी

जबकि
नदी भुला देती है
स्वयं को
चल देती है
ए़क लक्ष्य को लेकर
मन में उत्साह का प्रवाह लिए
सागर में
समाहित हो जाने की चाह में ।

देखा है कभी
सागर को
बाहें पसार
इन्तजार कर रहा होता है
नदी का
उसके उर में
होता है लहरों का अम्बार
और अकुलाहट होती है
नदी से मिलने की

नद
जहाँ जाती है
सभ्यता विकसित होती है
उत्सव होता है
झंकृत होते हैं लोकगीत

पहाड़ का अकेलापन
पत्थरों के भीतर के पत्थर से

डर जाती है नदी
पहाड़ की ऊंचाई भी
नहीं भाती नदी को
सागर के उर में समा
ए़क हो जाना चाहती है
नदी

सदा ही
हारा है पहाड़ का अहम
और जीती है
नदी ।

19 टिप्‍पणियां:

  1. सदा ही
    हारा है पहाड़ का अहम्
    और जीती है
    नदी ........

    badi sachchi baat kahi aapne..:)
    behtareen...........

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  2. puraanaa bhaaw hai magar kavitaa ke pichhe ki kavitaa samajhanaa achha lagaa.

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  3. इस कविता के जारी अरुण बाबू आपने पुरुषवादी और नरसत्तात्मक समाज के अहम् को कुरेदा है वहीं नदी रूपी स्त्री के मन का भाव और कोमल गुणों को भी उजागर किया है. कविता सीधे सीधे अपना प्रभाव तो छोड़ती ही है साथ ही इसका अभिधा में भी कुछ अर्थ निकलता है. दूसरा अर्थ ज्य़ादा मायने रखता है जहां पहाड़ के पास तन्हाई और हारी हुई लड़ाई रह गई है और नदी के पास कुछ नहीं होकर भी अपार खुशियाँ और बड़े होने वाले समुद्र में अपना हिस्सा शामिल होने का संतुष्टीकारक भाव.कुल मिलाकर बेहतर रचना है.

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  4. its an open ended poem where the interpretation depends on the thought process of the user. I believe River is a symbol of youth/energy/ and exuberance of life however a mountain is a symbol of a strong headed personality who is firm, calm and composed and exhibit strength and willpower which some time the other people take as arrogance...

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  5. मनुष्य होने और बने रहने की बिडंबनाएं आपकी इस कविता में जगह-जगह मौज़ूद हैं।

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  6. मेरे ख्याल से माणिक जी ने बिल्कुल सही विश्लेषण कर दिया है……………शायद इसके बाद कहने को कुछ बचता ही नही है सिवाय इसके कि बेजोड कविता है।

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  7. देखा है कभी
    सागर को
    बाहें पसार
    इन्तजार कर रहा होता है
    नदी का
    उसके उर में
    होता है लहरों का अम्बार
    और अकुलाहट होती है
    नदी से मिलने की

    anmol ehsaas

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  8. देखा है कभी
    सागर को
    बाहें पसार
    इन्तजार कर रहा होता है
    नदी का
    उसके उर में
    होता है लहरों का अम्बार
    और अकुलाहट होती है
    नदी से मिलने की ?
    ...........
    हाँ ! देखा है मैंने भी !

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  9. मिलन बिछोह प्रकृति के शाश्वत तत्व हैं।

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  10. मुझे तो ऐसा लगता है की नदी स्त्री लिंग है सो उसमें वो समर्पण की भावना स्वाभाविक है या यूँ कहे की की उसमें समर्पण की भावना है इसलिए स्त्री लिंग है

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  11. नदी के प्रवाह सी बहा ले गई ये रचना ..माणिक जी का विश्लेषण बहुत गहन है
    बहुत बढ़िया रचना

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  12. सदा ही
    हारा है पहाड़ का अहम
    और जीती है
    नदी ।

    बिलकुल नदी की तरह बहती रचना....पाठक रुपी सागर के मन में बसने को आतुर सी...

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  13. सदा ही
    हारा है पहाड़ का अहम
    और जीती है
    नदी ।
    अरुण जी ,
    नमस्कार !
    नदी ही सभ्यताओं को पनाह देती आई है , परिंदे को आकाश नापना है तो अपनी अपनी माँ का साया और घोंसला छोडना ही पड़ेगा ,
    साधुवाद

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  14. देखा है कभी
    हिमालय को
    उसका अहम
    पिघलने नहीं देता उसे....... Purushpradhan samaj ki yathartha........

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  15. बहुत ही अच्छी रचना.. अद्दभुत !!

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  16. comment through email:
    सुंदरता से बुनी हुई , सोचने के लिए आमंत्रित करती हुई अच्छी कविता! वाह!
    आलम ख़ुर्शीद

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