मंगलवार, 13 जुलाई 2010

पानी

किसी बड़े कवि ने
कहा था
पानी ही पानी
है चारो ओर
लेकिन पीने को
बूँद भर नहीं
कितना सही कहा था
उसने
सदियों पूर्व

पानी
आज भी तुम उतने ही उपयोगी हो
जितने वर्षो पूर्व
समय के चक्की पर
बदल गए तमाम रिश्ते
नहीं बदला तो बस
पानी का रिश्ता

पानी
जितने जरुरी हो तुम
उतने सहज भी हो
किसी भी आकार में
किसी भी रंग में
किसी भी रूप में
स्वयं को परवर्तित कर लेते हो
जानते हुए भी हम
कहाँ बन पाए
पानी
सहज

पानी
तुम्हारा प्रवाह
जितना प्यारा लगता है
बहती नदी के तट पर बैठ कर
उतना ही
भयावह और
प्रयालानकारी होते हो तुम
जब भूल जाते हो
सीमाओं को
हमे सदा ही तोड़ी हैं अपनी सीमायें
बिना सीखे कुछ तुमसे

तुम क्रोधित होकर
लाल नहीं होते
बल्कि शांत हो जाते हो
अपने भीतर सारी उर्जा समेत लेते हो
करने को उल्टा प्रहार
पानी
यह कला
तुमसे सीखने वाली है

पानी
मर्यादा क्या होती है
तुमने ही सिखाया है
इस सभ्यता को
स्थान और भाव से
बदल जाते हैं
रिश्ते
तुमने ही तो सिखाया है
वरना
जब ऊंचाई से गिरते हुए
तुम उर्जा के श्रोत ना हो जाते
तुमने ही बताया है
संभावना नहीं छोडो
गिरते हुए भी
क्योंकि रास्ते बन ही आते हैं
समय के साथ

पानी
बने रहो तुम
सबकी आँखो में
जब तक हो तुम
आँखों में
मौजूद है
हम-तुम
हम-सब

पानी
तुम उनकी आँखों में भी
सजे रहो
ताकि सजा रहू मैं
सदा सदा
तुम्हारी तरह

15 टिप्‍पणियां:

  1. जितना सहज, उतना ही प्रलयंकारी...

    हर रुप में ढल जाता है किन्तु जब नहीं रहेगा, हर रुप बदल जायेगा. इन्सानों को चेतना होगा...

    एक बहुत सार्थक अभिव्यक्ति!

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  2. संभावना नहीं छोडो
    गिरते हुए भी
    क्योंकि रास्ते बन ही आते हैं
    समय के साथ
    पानी के विविध रूपों का अत्यंत सहजता से आपने बयान किया है .. बहुत अच्छी लगी रचना

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  3. पानी
    बने रहो तुम
    सबकी आँखो में
    जब तक हो तुम
    आँखों में
    मौजूद है
    हम-तुम
    हम-सब ......... बिन पानी सब सून

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  4. "रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून" - इन शब्दों में लेखन ने गागर में सागर भरा और आपने उस गागर के पानी को अनंत सीमाओं में परिभाषित कर.. तमाम भाव, अनुभाव और संचरित भावों को बहुत ही सहज रूपों में पुरातनत से आधुनिक तक के पानी के अपरिवर्तनशील, सहज व आशावादी भावनाओ से ओत-प्रोत सहज स्वभाव के दर्शन को मानवीय मूल्यों और नीतिगत सन्देश बनाकर सरल शब्दों के ताने-बाने से बहुत ही खूबसूरती और नवीन बिम्बों और आयामों में आबद्ध कर किसी कुशल शिल्पी की तरह घड़ा है..जो कि सराहनीय होकर चिंतनशील भी है. ! इतनी उम्दा और चिंतनीय कृतत्व के लिए आपको बधाई और कोटिशः आभार !

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  5. रहीम दस जी का दोहा याद आ गया.....आपने पानी को सहज ही सहेजा है...बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

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  6. aapne is rachna se avgat karaya....dhanyawaad...


    man seetal ho gaya .....pani aur patther jitne sahaj aur jaha taha bikhre pare hai utne hi anmol hai...
    kitna gyan kitne raj hai inme....

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  7. अरूण भाई
    एक तो प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद
    दूसरा कविता के लिए भी
    अच्छा ही हुआ.. वरना एक अच्छी रचना को पढ़ने से वंचित रह जाता.

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  8. पानी
    बने रहो तुम
    सबकी आँखो में
    जब तक हो तुम
    आँखों में
    मौजूद है
    हम-तुम
    हम-सब
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

    aap jis bhi vishay ko chunte hai uske naye roop ujagar karte hai jo ek badi baat hai...

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  9. अभिव्यक्ति का यह अंदाज निराला है. आनंद आया पढ़कर.

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  10. मर्यादा क्या होती है
    तुमने ही सिखाया है
    इस सभ्यता को
    स्थान और भाव से
    बदल जाते हैं
    रिश्ते
    तुमने ही तो सिखाया है ...

    पानी ... का महत्व सदियों से रहा है और सदियों तक चलेगा ... जब कुछ भी नही था तो भी पानी था .... पानी है टाय जीवन है ... आज भी दूसरे ग्रहों में जीवन की खोज के लिए पहले पानी की खोज करी जाती है ....

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  11. पानी का इतना सुन्दर विवरण, वह भी काव्यात्मक।

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