शनिवार, 10 जुलाई 2010

तुम मेरे जीवन में


आँगन में
जैसे तुलसी
मेरे मन में
तुम हो बसी


जैसे मंदिर में
दिया की रोशनी
मन में मेरे
तेरी ही रश्मि


जैसे शिवालय में
घंटी के
स्वर हैं झंकृत
वैसे ही मन में
तुम हो अलंकृत


जैसे पूजा का
आस्था भरा
जल निर्मल
मन में बहती
तेरी स्मृति
सरल, सजल

13 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय अरुणजी
    नमस्कार !
    बहुत भावपूर्ण लघु प्रेम कविताएं लिखी हैं , बधाई !
    सुंदर… सरल… सह्ज…
    आपके अंदर सच में उच्च कोटि का रचनाकार छुपा है ।

    शस्वरं पर आपका हार्दिक स्वागत है , आप मेरी मित्र मंडली में भी हैं , आभारी हूं ।
    समय समय पर आते रहिए…
    सम्हालते रहिए…

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 11.07.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. बहुत सुन्दर भावों से सजी सुन्दर रचनाएँ..

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  4. सार्थक प्रयोग
    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  5. सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत आभार.
    अरुणजी

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  6. सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

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  7. मौसम का असर कविता में दिख रहा है. अच्छा है प्यार जाताना और उसका तरीका दोनों. मधुरता बनाये रखें

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  8. आँगन में
    जैसे तुलसी
    मेरे मन में
    तुम हो बसी
    waah

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